दिल में बातों का सैलाब उमड़ रहा है
और लोगों के नज़रों में
हम ख़ामोश पड़े हैं।
अब कोई रोशनी नहीं
पहुँचेगी मेरे कमरे में
मेरे घर के चारों तरफ़
ऊँची-ऊँची मीनारे बने हैं।
मेरे क़त्ल की गवाही
देगा कौन
मेरे हर दोस्त के हाथ
मेरे खुँ से जो सने हैं।
क्या तन के बलात्कारी ही
सज़ा के क़ाबिल है
तो क्यूँ मन के
बलात्कारी खुले में खड़े हैं।
कभी अपनी हर बात बताने
को बेताब थे जिन्हें
उन्हीं की हर बात
ज़माने से छुपाते फिरे हैं।
हर व्यक्ति इस संसार में खुनी है चाहे तन से या मनसे .....आखीर क्युं ??? क्या इंसानी जीवन ही खुनी परंपरा व प्रणाली से भरी पडी है ????
ReplyDeleteहां नेरा मन यही केहता है हर जींदा व्यक्क्ति साधू भी है तो जानवर के हर लक्षण मन में भरे पडे है. हमारा जीवन ही डब्लींग हे ,कोइ अेक को राजी करें दूसरा नाराज हेने ही वाला है .... यंहा जंहा जीवन है वंहा म्रत्यु है,जंहा संत है वंहा चोर है ,अेक ही इंसान कीसी का जीवन सजाता है वही दूसरी ओर जाने अंजाने में कीसी का जीवन उजाडता है ,ओर यह काल है वही हमारा जीवन है,इस ले आगे बढकर कहुं तो आज बहन बेटी अपने घर में ही सुरक्षीत नही ,ये बात सेल्ह आनी सच है हकीकत है....एर फीर यही हमारा जीवन है ......धन्यवाद,शुभदिन ,
वैयक्तिक और सामाजिक परिवेश के नकारात्मक पहलू को रेखांकित करती यह कविता मानव-मन के उलझनों को दर्शाती है। यह भी कि कौन क़त्ल हो रहा है, क्यों हो रहा है, क्यों किया जा रहा है और क़त्ल कर भी आनंद का अनुभव कौन कर रहा है! उत्तर भी तो अपने परिवेश में ही है ।
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