Sunday, 17 July 2016

वही पुरानी दास्तान.....

किसी की बेवफ़ाई को वफ़ा मान बैठे थे
हम नादान किसी के झूठ को सच जान बैठे थे।

सर उन्होंने इस अदा से था झुकाया
न मानने वाले न और मानने वाले हाँ मान बैठे थे।

वो झूठ के खेतों में सच का फल रहे दिखा
सचमुच में वो हमें बेअक्ल जान बैठे थे।

हम तो उतर गये लिए बोझ ज़िम्मेदारी का हाथों में
दीवाने थे जो सोचते कि ज़िंदगी के सफ़र में वो बेसमान बैठे थे।

हर कोई उठ कर जा चुका था हमारी महफ़िल से
हम भी तो वही पुरानी दास्तान लिए बैठे थे।

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