Friday, 15 July 2016

आँगन

हम ख़्वाहिशों की ही दुनिया बनाते हैं
ख़्वाहिशों में दुनिया भी तो सजाते हैं
कुछ ख़्वाहिशें मैंने भी पाली हैं
मैंने  भी ख़ुद को कुछ ख़्वाहिशें दे डाली हैं
सोचा था एक बड़ा सा घर बनाऊँगी
उसमें ख़ूब बड़ा एक आँगन रचाऊँगी
आँगन के बीच में तुलसी का वास हो
कुछ चिड़ियों का भी आँगन में प्रवास हो
तुलसी चौरे को ख़ुद से बना सकूँ
इसे रंगो से अपने हाथों से सज़ा सकूँ
इस आँगन में धूप बे रोक टोक आ जा सके
आँगन मद मस्त हो कर बारिश में नहा सके
बारिश से आँगन की बातें कमरे में भी आवाज़ लगा सके
महानगर में घर के नाम पर फ़्लैट पाया है
और बाल्कनी से आँगन का काम चलाया है
पर बाल्कनी में तुलसी सहमी सहमी है
वो गमले में कुछ वहमी सी है
बाल्कनी में तो सीधे धूप की मनाही है
किरणों की भी पड़ती कुछ देर के ही परछाईं है
बारिश भी इसे कुछ छींटे ही दे पाती है
बाल्कनी बारिश की बूँदो से काम चलती है
घर के कमरे भी तो बुदबुदातें हैं
पर आँगन जी खोल शोर मचातें हैं
आँगन की बातों में बेबाक़ी हैं
कमरों में कहाँ वो आज़ादी है
अब अपनी दुनिया में एक आँगन बसाऊँगी
हक़ीक़त ना सही ब्लॉग पर ही इसे सजाऊँगी
कुछ पौधे भी इसके लिए लेकर आऊँगी
समय ने साथ दिया तो तुलसी चौरा भी बनाऊँगी
और तुलसी चौरा अपने हाँथों से सजाऊँगी।


5 comments:

  1. आँगन - विहीन परिवेश में हम आँगन को अपने भीतर सँजोकर जी रहे हैं, यह आँगन के प्रति हमारे प्रेम और उसकी अनिवार्यता को दर्शाता है। इसलिए तो उस आँगन की खोज में हम फिर-फिर अपनी माँ के आँगन की ओर भागते हैं।

    भावपूर्ण रचना है आपकी अनीता जी।

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    1. क्या बात है अशोक जी .... बिलकुल सही .... पर जो है उसी से काम चलाते है ... ब्लॉग में ही आँगन बनाते हैं..😂😂😂👌

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  2. आँगन - विहीन परिवेश में हम आँगन को अपने भीतर सँजोकर जी रहे हैं, यह आँगन के प्रति हमारे प्रेम और उसकी अनिवार्यता को दर्शाता है। इसलिए तो उस आँगन की खोज में हम फिर-फिर अपनी माँ के आँगन की ओर भागते हैं।

    भावपूर्ण रचना है आपकी अनीता जी।

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  3. Nice Mausi,
    Aangan ji khol shor machate hai.
    Very wel

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    1. Thanks Abhishek... Tumhe pasand aaya accha laga....

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