हम ख़्वाहिशों की ही दुनिया बनाते हैं
ख़्वाहिशों में दुनिया भी तो सजाते हैं
कुछ ख़्वाहिशें मैंने भी पाली हैं
मैंने भी ख़ुद को कुछ ख़्वाहिशें दे डाली हैं
सोचा था एक बड़ा सा घर
बनाऊँगी
उसमें ख़ूब बड़ा एक
आँगन रचाऊँगी
आँगन के बीच में तुलसी
का वास हो
कुछ चिड़ियों का भी
आँगन में प्रवास हो
तुलसी चौरे को ख़ुद से
बना सकूँ
इसे रंगो से अपने हाथों
से सज़ा सकूँ
इस आँगन में धूप बे रोक
टोक आ जा सके
आँगन मद मस्त हो कर
बारिश में नहा सके
बारिश से आँगन की बातें
कमरे में भी आवाज़ लगा सके
महानगर में घर के नाम
पर फ़्लैट पाया है
और बाल्कनी से आँगन का
काम चलाया है
पर बाल्कनी में तुलसी
सहमी सहमी है
वो गमले में कुछ वहमी
सी है
बाल्कनी में तो सीधे
धूप की मनाही है
किरणों की भी पड़ती कुछ
देर के ही परछाईं है
बारिश भी इसे कुछ छींटे
ही दे पाती है
बाल्कनी बारिश की बूँदो
से काम चलती है
घर के कमरे भी तो
बुदबुदातें हैं
पर आँगन जी खोल शोर
मचातें हैं
आँगन की बातों में
बेबाक़ी हैं
कमरों में कहाँ वो
आज़ादी है
अब अपनी दुनिया में एक आँगन
बसाऊँगी
हक़ीक़त ना सही ब्लॉग
पर ही इसे सजाऊँगी
कुछ पौधे भी इसके लिए
लेकर आऊँगी
समय ने साथ दिया तो
तुलसी चौरा भी बनाऊँगी
और तुलसी चौरा अपने
हाँथों से सजाऊँगी।
आँगन - विहीन परिवेश में हम आँगन को अपने भीतर सँजोकर जी रहे हैं, यह आँगन के प्रति हमारे प्रेम और उसकी अनिवार्यता को दर्शाता है। इसलिए तो उस आँगन की खोज में हम फिर-फिर अपनी माँ के आँगन की ओर भागते हैं।
ReplyDeleteभावपूर्ण रचना है आपकी अनीता जी।
क्या बात है अशोक जी .... बिलकुल सही .... पर जो है उसी से काम चलाते है ... ब्लॉग में ही आँगन बनाते हैं..😂😂😂👌
Deleteआँगन - विहीन परिवेश में हम आँगन को अपने भीतर सँजोकर जी रहे हैं, यह आँगन के प्रति हमारे प्रेम और उसकी अनिवार्यता को दर्शाता है। इसलिए तो उस आँगन की खोज में हम फिर-फिर अपनी माँ के आँगन की ओर भागते हैं।
ReplyDeleteभावपूर्ण रचना है आपकी अनीता जी।
Nice Mausi,
ReplyDeleteAangan ji khol shor machate hai.
Very wel
Thanks Abhishek... Tumhe pasand aaya accha laga....
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