Tuesday, 26 July 2016

वो कहता रहा और भी और भी

एक शख़्स हर बात पर कहता मिला ‘और भी’
लोग पूछते कुछ पर जवाब आता ‘और भी’

कुछ ने समझा बेबस, कुछ ने दीवाना उसे
पर आदमी की शक्ल में आदमी था कुछ और ही

हर बात पर दुआएँ देते जाने वाला
लोगों को कहता दिल खोल दो दुआएँ और भी

ज़ख़्म खाता हर दर्द पर चीख़ जाता
पर हर दर्द पर चिल्लाता एक दर्द और भी

दवा की पोटली के बोझ का मारा हुआ
झोली फैलाये कहता दे दवा कुछ और भी

कुछ देख उसे ‘आह’ कह गए कुछ ‘वाह’ कह गए
पर कहता रहा वो ‘और भी’ ‘और भी’ ‘और भी’ 


1 comment:

  1. वह कहेता रहा नही अभी अभी
    कहेता आया वो लदीयों से
    लेलो दूआ और भी देदो ये ऐर भी
    जखम देने वाले देते रहे नही ठके फीर भी
    अेक अकेला दूआ रहा देता रहा फीर भी
    कोई देता जखम कोइ देता दूआ
    फर्क सिर्फ इतना नही जखम या दुआ देना
    अेक था शैतान तो अेक फीर फरिस्ता
    अरे दोस्त हीमन रामने सही कहा
    कोन शैतान ?? कोन फरिस्ता ??
    रुदय चीर के देख तेरे ही भीतर दोनों बैठे
    इस कोणे शैतान तो उधर है...फरिस्ता
    देखे जमाना तुंही दे जखम तूंही खाये जखम
    तूंही दैता आह तो तूंही लेता वाह
    चीखने चीखाने की कसम तूं नीभाता
    वही दूआ उपर दूआ तूंही देता रहा
    वाह रे उपरवीले कमाल क्या तेरा
    जीसे बनाया शैतान उसे ही बनाया फरिस्ता
    यही करता पाप तो पुन्यं भी उसीका
    दीन भी तेरा रात भी तेरी

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