ज़िंदगी को हम इतना उलझाते क्यूँ हैं?
बिन बात की बात हम बनाते क्यूँ हैं?
ज़िंदगी कब हासिल चीज़ों की दुकान है
न हासिल चीज़ों पर जान लगाते क्यूँ है?
नाकामी भी तो ज़िंदगी की ही देन है
नाकामी के डर से हम घराते क्यूँ है?
स्कूली इम्तिहान कब से है ये ज़िंदगी
अनसुलझे सवालों पर हम सर खपाते क्यूँ है?
वक़्त कब रुका है किसी
के भी रोके
वक़्त को बे-वक़्त सोच
कर समय गँवाते क्यूँ है?
कुछ कोशिशों का नाम ही
तो है ज़िंदगी
फिर पहले हाथ बढ़ाने
में हम समय लगाते क्यूँ है?
चारदीवारी में बंद
ज़िंदगी दुनियादारी का नाम है
ज़िंदगी को हम दुनियादारी की बातों से समझाते क्यूँ है?
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