कितनी आसानी से
उन्होंने हर बात बदल दी
हमने हालत बताये
उन्होंने सवालात हमारे ऊपर जड़ दी।
अपनी नासमझी पे हम आज
भी शर्मिंदा हैं
पर उन्होंने अपनी
कमज़ोरियाँ भी हमारे सर मड़ दी।
बस कुछ सवाल ही तो
ज़िंदगी के थे पूछे
जवाब में कितनी सारी
किताबें हमारे हाथ में धर दी।
हम तो आज भी अनजान है
दुनिया के रस्मों सें
आज फिर उन्होंने
दुनियादारी का पाठ हमारे सामने पढ़ दी।
कब तक जूझते रहे हम
अनसुलझे सवालों से
लो हमने भी उल्टे-सीधे
जवाब ज़माने के लिए गढ़ दी।
यही होता आ रहा है मैडम, करता एक है, भरते सभी हैं।
ReplyDeleteसही होता है मैडम, करता एक है, भरते सभी हैं।
ReplyDeleteपर नहीं होना चाहिए।
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