Tuesday, 30 August 2016

ज़रूरी तो नहीं

सुनिए हर बात, हर बात सुनना ज़रूरी तो नहीं
हमने तो अपनी कहीआपकी हो ज़रूरी तो नहीं

हमने पहचाना  है उन्हें उनकी किताबों से
सबने पढ़ी हो वो वाकियात ज़रूरी तो नहीं

जिनके वादे पर गुज़ार ली ज़िंदगी हमने
उन्हें भी हो हर बात याद ज़रूरी तो नहीं

टूटे पत्ते हैं शाख़ के पर है हमारे जज़्बात दरख़्तों से
हो दरख़्तों के भी ऐसे ही ख़यालात ज़रूरी तो नहीं

जो गुज़री थी हमपे वो सुनाई महफ़िल को
हों सबके वैसे ही हालात ज़रूरी तो नहीं

अब छोड़नी पड़ेगी अधूरी ही वो दास्ताँ 
हर दास्ताँ मुकम्मल कहलाये ज़रूरी तो नहीं

सुकून की तलाश में आज भी भटक रहा इंसान
हर दिल को मिले जहाँ में क़रार ज़रूरी तो नहीं 

  

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