Monday, 15 August 2016

ग़लती


ग़लत को ग़लत कहना जिस दिन हमने सिख लिया
समझो दुनिया की आधी बुराई उस दिन हमने जीत लिया।

ग़लती कर-कर के ही बेहतर हम हो पाए हैं
ग़लतियों के सहारे ग़लतियों को ही हमने जीत लिया।

ग़लत राह पर चल पड़े थे ग़लतियों के सहारे
ग़लती से ग़लत इन्सान ने हमारा भरोसा जीत लिया।

ग़लत ग़लत ही होता है लाखों के सहारे भी खड़ा हो
सच के साथ अकेले रहकर उसने लाखों का मन जीत लिया।

ख़ामोशी ही दवा है उनकी ग़लतियों कि बीमारी का
उनकी ग़लतियों को आज हमने ख़ामोशी से जीत लिया।

अपनी हर ग़लतियाँ अब हम सर झुका कर मानते हैं
ग़लती पर झुकने से हमने रिश्तों का विश्वाश जीत लिया।


2 comments:

  1. Bahot Khubsurat Ghazal. Hamaare vichar, anuumaan, niryan sahi aur galat saath saath hoten hai - samay aur sanyog se hum koi ek ka chunaav karten hain.

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  2. तहे दिल से शुक्रिया की आपने पसंद किया । पर लगता है हम में से अधिकांश जिसमें मैं भी शामिल हूँ कई बार ग़लत को ग़लत कहने का साहस नहीं जुटा पाते। माहौल भी कई बार मजबूर करता है। तरक़्क़ी के लिए एस बॉस का ज़माना है ना। पर करना होगा जितना बन पड़ें।

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