Friday, 19 August 2016

ख़्वाहिशों की ये ज़िंदगी

ख़्वाहिशों के साँचे में ढल रही है ये ज़िंदगी
ख़्वाहिशों के बोझ तले चल रही है ये ज़िंदगी।

ख़्वाहिशों की चिंगारी ज़िंदगी को रही जला
फिर भी ख़्वाहिशों के नाम ख़ुद को कर रही है ये ज़िंदगी।

वक़्त बे वक़्त आती इन ख़्वाहिशों का क्या करे
एक के जाते ही दूसरे के पीछे पड़ रही है ये ज़िंदगी।

ख़्वाहिशों के बिना सुना ज़िंदगी का ये ज़हान
ख़्वाहिशों के साय में आगे बढ़ रही है ये ज़िंदगी।

चलो एक ख़्वाहिश और ले ज़िंदगी में सज़ा
क्या गिला जो पुरानी ख़्वाहिशें बदतर कर रही है ये ज़िंदगी।

ख़्वाहिशों की मौत ज़िंदगी की ही तो मौत है
ख़्वाहिशों के मरते ही मर रही है ये ज़िंदगी।

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