Saturday, 13 August 2016

ज़िंदगी किधर गई

मुठ्ठी भर ज़िंदगी उठाई थी जाने कहाँ बिखर गई
जब मुठ्ठी खोला कुछ नहीं था जाने कैसे फिसल गई।

कुछ पाने की कोशिश में जो आया वो भी चला गया
वो आँधी कुछ ऐसी आई हर चीज़ लेकर गुज़र गई।

कुछ तो हक़ बनता था इन ख़ामोशी का बातों पर
आवाज़ों की महफ़िल से ख़ामोशी चुपके से निकल गई।

अब सिर्फ़ ये दुनिया है और कुछ दुनियादारी है
रिश्तों के बोझ तले ज़िंदगी पूरी तरह सिमट गई।

2 comments:

  1. परिस्थितियों की प्रतिकूलताओं को द्योतित करती यह रचना विवश चेतना का चित्रण है। इससे निकलकर जीवन तो जीना ही है, वो भी मुस्कान की छटा के साथ।

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    1. बिलकुल जी और ज़िंदगी है तो ये चलती रहेगी।

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