कुछ अंधेरे ज़िंदगी में
और बढ़ा दो
कुछ ख़्वाहिशों के बोझ
ज़िंदगी से हटा दो।
मंज़िल की चाहत अब हमें
कहाँ
रास्ते
में कुछ काँटे और बिछा दो।
हमने सच्चाई को हाँथों
से थामा हैं
दुनियादारी का बोझ दे
कर इसे सज़ा दो।
लोग देखने का हुनर आज
भी रखते हैं
चेहरे पर जितना चाहो
मुस्कान फैला दो।
ना उम्मीदी की इस
ज़िंदगी को
थोड़ा अब ख़ौफ़ज़दा भी
बना दो।
न अपनी ख़ुशी से आयें
हैं न अपनी ख़ुशी से जाएँगे
क्या ग़म, दर्द ज़िंदगी
में अब जितने चाहे मिला दो।
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