Monday, 8 August 2016

विभीषण

एक अजीब सा वातावरण चारों तरफ पल रहा है।
कोई खुद को राम और किसी को रावण कह रहा है।

आज कल कोसने के लिए एक नाम और जुड़ा है।
नीचा दिखाने के लिए अब विभीषण नाम भी पडा है।
विभीषण ये नाम तो मुझे बहुत ही प्यारा है।
विभीषण ने तो हमारे भगवान राम का जीवन संवारा है।

विभीषण ने रावण का साथ छोडा था।
उसने तो अच्छाई से अपना नाता जोड़ा था।
सच्चाई के लिए वो परिवार में अकेला ही खडा था।
हाँ सच्चाई के लिए वो अपने सगे भाई से लडा था।

विभीषण नहीं होता तो भगवान राम हार ही जाते।
वो बुराई पर अच्छाई का प्रतीक कैसे बन पाते।
मान लो वो सीता को जीत कर ले ही आते।
पर रावण को मारे बिना हम विजयदशमी नहीं मनाते।

पर फिर भी क्यो सिर्फ राम ही पूजे जाते।
किसी मन्दिर में विभीषण क्यों नजर नहीं आते।
राम, ये नाम तो घर घर में देखा जाता है।
पर रावण ये नाम तो कोई बच्चों को नहीं दे पाता है।

विभीषण ये नाम भी तो किसी बच्चें का नहीं पडा है।
मतलब क्या विभीषण रावण की पक्ति में खडा है।
मेरा विश्वास और भी प्रबल हो चला है।
क्यों किसी माँ बाप ने अपने बच्चें का नाम विभीषण नहीं धरा है

राम हम सब जानते है अच्छाई की श्रेणी में आता है।
और रावण उसका तो सिर्फ बुराई से नाता है।
तो विभीषण वो फिर किस श्रेणी में जगह पाता है।
उसका बुराई या अच्छाई किस से नाता है।

विभीषण के सहारे ही तो भगवान जीत का स्वाद चखते है।
फिर भी माँ बाप विभीषण बच्चों का नाम क्यों नहीं रखते है।
विभीषण कब से और क्यों इतना बुरा है।
या परिवारवाद अच्छाई के ऊपर खडा है।

घर का भेदी लंका ढाहे ये सब ने कितना सुनाया।
पर लंकापति बुराई का प्रतीक था ये कहाँ कोई इसमें जोड पाया।
मतलब माँ बाप के लिए परिवार सबसे बडा है।
शायद इसलिए विभीषण सिर्फ रामायण में ही पडा है।

विभीषण को हम घर से धोखा देने की सजा दे रहे है।
उसकी अच्छाई के लिए हम उसे कहाँ ढो रहे है।
हाँ सही में अच्छाई से परिवारवाद आज भी बहुत बडा है।
परिवारवाद आज भी अच्छाई पर भारी पड़ा है
परिवार की बुराइयों से लडने वाला विभीषण आज भी अकेला ही खडा है।



2 comments:

  1. वास्तव में ,हमारे समाज में विभीषण की पूर्व-स्थिति को नहीं देखा जाता है कि उन्होंने अपने भाई को कितना समझाया था। अब जब अपने कर्मों से लंकापति का विध्वंस हो गया तो उसका कारण भाई की सात्त्विक प्रवृत्ति बना दी गई। ऐसे स्थलों पर ही समाज ने सत्य को भी कठघरे में खंड़ा कर दिया है।

    बहुत अच्छा संदर्भ लेकर आपने रचना की है, बधाई।

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    1. ये कविता डेढ़ साल पुरानी है। आज भी मेरे फ़ेस्बुक पर है। दिल्ली विधान सभा चुनाव से पहले की, अगर याद होगा तो उस समय किरण बेदी को लोगों ने विभीषण कहा था और वही इस कविता के लिखने की वजह बनी। विभीषण को उसका उजित सम्मान लगता है नहीं मिला। विभीषण किसी को नीचा दिखाने या कोसने के लिए ग़लत रूप में इस्तमाल आज भी होता है। विभीषण हमारे समाज की ज़रूरत है।

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