Monday, 5 December 2016

इताब दिल में है और इज़्तिराब भी तो है

इताब  दिल में है और इज़्तिराब भी तो है
बात दिल की है जो एक खुली किताब भी तो है

सच को बताने में इतनी तबक़्क़ूफ क्यूँ जनाब
मत सोचिए इतना वक़्त आता ख़राब भी तो है।

क़ासिद न बायाँ कर हर सच तू उनकी बातों का
कुछ ख़्वाब रहने दे गुज़ारनी ज़िंदगी में रात भी तो है।

उन से रूठे तो हम पर कब तक रूठे रहे भला
दिल उनकी बातों से हो रहा ला-जवाब भी तो है।

मुंतज़िर न बन न टूट ख़ुद से तू इस क़दर
याद रहे तू किसी की आँखों का ख़्वाब भी तो है।

ज़िंदगी को बेवफ़ा कहूँ तो किस मुँह से कहूँ
खुदा का हम पर दाख़िल-ए-सवाब भी तो है।



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