Friday, 16 December 2016

ज़िंदगी से हम बंध कर ही क्यों रहें

ज़िंदगी से हम बंध कर ही क्यों रहें
ज़िंदगी ने ऐसे कौन से करम हमपे किये ।

बेवफ़ा है ज़िंदगी बेवफ़ाई इसका काम है
तो हम क्यूँ बा-वफ़ा बन के ही जियें।

ज़िंदगी अपने दामन में दर्द ही है छुपाए
देखते हैं मौत क्या सौग़ात हमारे लिए है लिये।

न आते हम जहाँ में तो क्या होता
ये सवाल भी ख़ुद में एक जवाब है लिये।

चलो अब कुछ मौत को ही हैं सजाते
ज़िंदगी ने तो हर अरमान हमसे ले लिये।


2 comments:

  1. गर शाम आयी है तो सुबह का इंतज़ार करो
    वक़्त अपना है उस वक़्त पर ऐतबार करो
    अपनी चाहत, अपना हुनर,अपने भरोसे का न व्यापर करो
    ज़िन्दगी हसीं है इस ज़िन्दगी से प्यार करो

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    1. वक़्त हर बार रूप बदल कर आता है
      ख़ुशी के नक़ाब में ये ग़म भी लाता है

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