आँगन Angan
चारो तरफ बिखरी पड़ी है आज भी ये जिंदगी, इसे समेट सकूँ ये सहूलियत भी वक्त ने कब दी.....
Friday, 16 December 2016
नहीं चाहिए हे नाथ
नहीं चाहिए हे नाथ
झूठी आस झूठा विश्वास
सपनों से बंधा मेरा मन
यथार्थ में भीगा ये तन
उम्मीदों का वो स्पन्दन
टूटा कुछ दिल के अंदर
बहरूपिया बना ये जीवन
नहीं चाहिए हे नाथ
टूटती आस टूटता विश्वास
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