इताब दिल में है और इज़्तिराब भी तो है
बात दिल की है जो एक खुली किताब भी तो है।
सच को बताने में इतनी तबक़्क़ूफ क्यूँ जनाब
मत सोचिए इतना वक़्त
आता ख़राब भी तो है।
क़ासिद न बायाँ कर हर सच तू
उनकी बातों का
कुछ ख़्वाब रहने दे गुज़ारनी
ज़िंदगी में रात भी तो है।
उन से रूठे तो हम पर कब
तक रूठे रहे भला
दिल उनकी बातों से हो
रहा ला-जवाब भी तो है।
मुंतज़िर न बन न टूट
ख़ुद से तू इस क़दर
याद रहे तू किसी की
आँखों का ख़्वाब भी तो है।
ज़िंदगी को बेवफ़ा कहूँ
तो किस मुँह से कहूँ
खुदा का हम पर
दाख़िल-ए-सवाब भी तो है।
Wow! Beautiful #Ghazal :)
ReplyDeleteThanks a lot..nice to see your comment
Deleteबहतरीन
ReplyDeleteशुक्रिया
Deletenice poetry correct 5 line Kaasid कासिद
ReplyDeleteThanks a ton..correcting it..thanks again for pointing
Deleteबहोत खूब अनीता जी
ReplyDeleteशुक्रिया
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