Thursday, 1 December 2016

हर तरफ़ सिर्फ़ दहशतों के माहौल दिख रहे

हर तरफ़ सिर्फ़ दहशतों के माहौल दिख रहे
वक़्त ऐसा है इंसान दहशत के नाम बिक रहे।

एक हँसी एक मुस्कान कभी ज़िंदगी का मक़सद थी
अब दिखावे के जीने के ये सलीक़े भी न टिक रहे।

न दोस्ती न दुश्मनी थी जिनके दरमियान
उन लोगों के बीच ये फ़ासले कौन लिख रहे।

कभी रिश्तों से होती थी रौनक़-ए-जहाँ
अब रिश्ते भी ज़रूरतों के लिए टिक रहे।

सियासत ने अपना मक़सद पा लिया
हर चौराहे पर लोग नफ़रत लिख रहे।


2 comments:

  1. अब तो व्यापiर बन गयी है दहशतगर्दी ,
    दौलत के लालच में अब्दुल और राम बिक रहे
    जिन आँखों में सपने थे सुनहरे कल के
    आज खून -इ -रंग से भरे वो सब तमाम बिक रहे

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    1. डर को हमने ज़िंदगी में ख़ुद बसाया है
      उसकी ख़ातिरदारी की उसे बहकाया है

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