हर तरफ़ सिर्फ़ दहशतों
के माहौल दिख रहे
वक़्त ऐसा है इंसान दहशत
के नाम बिक रहे।
एक हँसी एक मुस्कान कभी
ज़िंदगी का मक़सद थी
अब दिखावे के जीने के
ये सलीक़े भी न टिक रहे।
न दोस्ती न दुश्मनी थी
जिनके दरमियान
उन लोगों के बीच ये
फ़ासले कौन लिख रहे।
कभी रिश्तों से होती थी
रौनक़-ए-जहाँ
अब रिश्ते भी ज़रूरतों
के लिए टिक रहे।
सियासत ने अपना मक़सद
पा लिया
हर चौराहे पर लोग नफ़रत
लिख रहे।
अब तो व्यापiर बन गयी है दहशतगर्दी ,
ReplyDeleteदौलत के लालच में अब्दुल और राम बिक रहे
जिन आँखों में सपने थे सुनहरे कल के
आज खून -इ -रंग से भरे वो सब तमाम बिक रहे
डर को हमने ज़िंदगी में ख़ुद बसाया है
Deleteउसकी ख़ातिरदारी की उसे बहकाया है