Friday, 23 December 2016

हम अब कहाँ उनकी बातों पर फ़िदा हैं

हम अब कहाँ उनकी बातों पर फ़िदा हैं
वो सही कहें, हमें पता हमने ग़लत लिखा है।

अब किसी के दिखाए हम नहीं देखते
हम जानते हैं हमारी कौन सी जगह है।

लोग फिर अपनी बातों से तसल्ली देने आ गए
किसी को क्या मालूम हमने क्या क्या सहा है।

उनकी बेरुख़ी अब और नहीं सही जाती
इससे कहीं अच्छा उनका ग़ुस्सा लगा है।

उसे जाना था तो ख़ामोशी से चला जाता
साथ अपने हमारी ज़िंदगी क्यूँ ले गया है।

अपनी आखों पर हम यक़ीं करे भी तो कैसे
नमक से कई बार हमें चीनी का धोखा हुआ है।

जिसे जाना है हमारी ज़िंदगी से ख़ुशी से जाए
हमने अपनी ज़िंदगी के बिना जीना सीख लिया है।

पीछे मुड़ मुड़ कर देखना किस काम का
क्यूँ ऐसा करे जिससे आगे का नहीं दिखा है।

चीख़ अपनी हमने आज सबसे है छुपायी
इसका मतलब ये नहीं हमें दर्द नहीं हुआ है।

जहाँ हम बिछड़े वहाँ दिल क्यूँ है खोया हुआ
वक़्त कहाँ उस जगह खड़ा उसे गए ज़माना हुआ है।

हर बार टूटती उम्मीदों से हम बाज़ आए
लीजिए हमने माना क़िस्मत का लिखा ही हुआ है।

दिल को इस बात का यक़ीं दिलाए तो कैसे
जो दिल-ए-जान था कभी आज अजनबी बना हुआ है।

दे कर पाने की उम्मीद मोहब्बत में जनाब
ये इश्क़ है या आपने कोई सौदा किया है।

अब और आपको हम कभी भी न समझाएँगे
आप न बदले पर नज़रों ने हमारा ओहदा कम किया है।

हर बात के बारे में अब हम क्यूँ सोचें
खुदा का काम हमने कब से अपने सर लिया है।

ये मोड़ भी ज़िंदगी में कुछ अजीब सा है आया
जहाँ हम सबको समझा रहे ऐसा हमने क्यूँ लिखा है।



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