Saturday, 24 December 2016

चलते रहने से ज़िंदगी हर वक़्त साथ खड़ी है

चलते रहने से ज़िंदगी हर वक़्त साथ खड़ी है
रूकती ज़िंदगी में मौत की ही एक बेबसी है।

किताबें भी अब कितना झूठ बोलती हैं
माँ की सिखाई बात भी झूठ हो रही है।

लफ़्ज़ों से वो ख़ुद का यक़ीं दिला रहे हैं
ज़िंदगी में लोगों के देखिए कितनी बेबसी है।

आप क्यूँ बातों को बदल कर सामने ला रहे हैं
हम जानते हैं ग़ुस्से में आपने हर बात सच कही है।

ज़िंदगी रही तो हौसले से कुछ कर ही लेंगे
मकान कहते हैं जिसे उसकी दीवार ही तो गिरी है।

अब क्या अपनी बात रखने की भी मनाही है
हमने कब कहा हमने हर बात सच ही कही है।

चाहतें भी माँग कर पाई जाए
ख़ुद्दारी भी क्या बेच रखी है।

हम आपका हर सच कब जानना चाहते थे
पर ये क्या बात आपने सिर्फ़ झूठ रखी है।

चल रहे हैं हम ज़िंदगी के ही चलाए
पर कैसे मालूम हो कौन सी राह सही है।

अपनी हर बात को उनकी नज़रों से समझाए
महफ़िल ने ये अजीब बंदिश हम पे डाल रखी है।



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