जिस्म का कुछ क़र्ज़
उतारेंगे
एतवार को लेट कर
गुज़ारेंगे
बहुत टूटा टूटा सा है ये
मन
इसे भी आज फ़ुर्सत से
सवारेंगे
बहुत हुआ इश्क़-ए-बुत
पर लिखना
कोई और जज़्बात अब
शायरी में डालेंगे
सुबह से शाम हम सिर्फ़ बक
बक कर रहे
अपनी बातों को अब कम
लफ़्ज़ों में निखारेंगे
अपनी हरकतों से हम ख़ुद
ही परेशान हैं
अब ख़ुद को भी हम कुछ तो सुधारेंगे
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