पहाड़ बन हर वक़्त खड़ी
थी
आँधियों को हँस कर सह
रही थी
मौसम भी मुझे कहाँ सता
पाया
मैंने ख़ुद को हर हाल
में था बचाया।
पर ज़िंदगी ने मुझमें
एक खेल रचाया
मुझमें भी उम्मीद का एक
बारूद आया
उम्मीदों को मैंने दिल
में बिठाया
अपने मन में उम्मीदों
का एक बाँध बनाया।
टूटी उम्मीद बारूद ज़ोर
से फटा
देखिए मेरा क्या हाल
हुआ
अब मैं पहाड़ कहाँ रह
गई थी
छोटे-छोटे पत्थरों में
धरती पर पड़ी थी।
कितनी आसानी से किसी ने
मेरा अस्तित्व मिटाया
टूटी हुई उम्मीद ने खुल
कर अपना रंग दिखाया
पहाड़ अब धरती बन चुका
था
उम्मीदों के भार से ढल
चुका था।
काश ज़िंदगी की ये चाल
समझ पाती
काश उम्मीदों के जगने
से ख़ुद को बचाती
काश उम्मीद दिल में जगह
नहीं बनाती
मैं धरती पर इस तरह
टूटी नज़र नहीं आती।
पर्वत तो पर्वत है उसे हिला पाया है कौन
ReplyDeleteधरती के उस आधार की शक्ति है गौण
अनेक प्रजातियों का है वो जीवन
देता सबको निर्मल जल पावन
पर्वत भी धरती से घबराया है
Deleteधरती पे जब भी भूकम्प आया है
समय की है जब बात चली है
चींटी से हाथी भी मात खाया है