Friday, 16 December 2016

उम्मीद

पहाड़ बन हर वक़्त खड़ी थी
आँधियों को हँस कर सह रही थी
मौसम भी मुझे कहाँ सता पाया
मैंने ख़ुद को हर हाल में था बचाया।

पर ज़िंदगी ने मुझमें एक खेल रचाया
मुझमें भी उम्मीद का एक बारूद आया
उम्मीदों को मैंने दिल में बिठाया
अपने मन में उम्मीदों का एक बाँध बनाया।

टूटी उम्मीद बारूद ज़ोर से फटा
देखिए मेरा क्या हाल हुआ
अब मैं पहाड़ कहाँ रह गई थी
छोटे-छोटे पत्थरों में धरती पर पड़ी थी।

कितनी आसानी से किसी ने मेरा अस्तित्व मिटाया
टूटी हुई उम्मीद ने खुल कर अपना रंग दिखाया
पहाड़ अब धरती बन चुका था
उम्मीदों के भार से ढल चुका था।

काश ज़िंदगी की ये चाल समझ पाती
काश उम्मीदों के जगने से ख़ुद को बचाती
काश उम्मीद दिल में जगह नहीं बनाती
मैं धरती पर इस तरह टूटी नज़र नहीं आती।





2 comments:

  1. पर्वत तो पर्वत है उसे हिला पाया है कौन
    धरती के उस आधार की शक्ति है गौण
    अनेक प्रजातियों का है वो जीवन
    देता सबको निर्मल जल पावन

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    1. पर्वत भी धरती से घबराया है
      धरती पे जब भी भूकम्प आया है
      समय की है जब बात चली है
      चींटी से हाथी भी मात खाया है

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