ख़्वाबों को झूठी बारात
बेच रहे हैं
सौदागर दिन को रात बेच
रहे हैं।
अख़बारों सी लगती है ये
दुनिया
बिना सुने लोग अपनी बात
बेच रहे हैं।
बेचने के सौदे में अब
कहाँ कोई ईमान
ज़रूरत के लिए लोग सवालात
बेच रहे हैं।
फिर आज का दिन जाने को है
आया
फिर लगा हम ख़ुद को बस
ख़यालात बेच रहे हैं।
बेचने निकले तो हमने भी
ये जाना
बिना झूठ मिलाये हम कहाँ
कुछ आज बेच रहे हैं।
हर चीज़ को बेचने की चाहत में
लोग कितनी आसानी से जज़्बात बेच रहे हैं।
बेच कर भी आपने कुछ न कमाया
आप कौन सी ऐसी ख़ैरात बेच रहे हैं।
बहुत तकलीफ़देह है पर कुछ बेचना
ऐसा लगा हम झूठा विश्वास बेच रहे हैं।
Wah wah
ReplyDeleteशुक्रिया
DeleteWah Wah Bohat acchi Ghazal hai
ReplyDeleteतहे दिल से शुक्रिया
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