Wednesday, 18 January 2017

नदी

नदी अपने जीने के लिए अपना रास्ता खुद निकालती है 
खुद के लिए किनारे भी देखिये वो खुद ही तो संवारती है

आसमान से उसे कब कहाँ कोई भी है उम्मीद 
पर आसमान की छवि को भी वो खुद में निखारती है

वो मनमौजी मनचली अपनी राह पर ही तो चली 
मंज़िल के लिए कब वो पैर घर से बहार निकालती है 

ज़मी की उम्मीद में बहती हुई उसकी ज़िन्दगी 
पर राह में कुछ जिंदगियां भी तो वो संवारती है 

बदलना समय के अनुरूप कोई नदी से सीखे 
हर क्षण उसी जगह वो खुद को बदल डालती है 

अजीब सी है उसके अपनाने और भरने की प्यास 
कितनी भी भरी हो, खुद को और भर देना चाहती है

उसके संकल्प और दृढ़ता की क्या कोई बात करे 
अपनी जिद्द से वो राह के चट्टानों को भी तोड़ डालती है 

पर इस नकचढ़ी के साथ चलो तो इसे मंज़ूर 
विपरीत दिशा में चलने से ये भी अड़चने डालती है 

खुद की तलाश में वो खुद भी तो है परेशान
पर ज़रूरतों के लिए ये कई बार खुद को मारती है

घर छोड़ने पर वापस आना कहाँ सम्भव हुआ है 
ये विचार भी तो हममें एक बार ये ज़रूर डालती है 

पहाड़ों से उतरी, कुछ प्यासी, कुछ व्याकुल सी
कैसे सागर से मिलते ही स्थिर सागर सी बन जाती है   



11 comments:

  1. बहोत बढ़िया अनीता जी

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद सुशील जी

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  3. Replies
    1. No idea what you wrote .. wish I can understand Urdu .. but I can't .. sorry

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  4. नहीं है आसान नदी की राह चलना
    चट्टानों को चीर के आगे को बढ़ना
    कदम कदम पर हैं विषैले जीव
    जो तोड़ देते हौसला, सिखाते डरना

    नदी भी तो पछताती होगी ऐसी राह चल के,
    उसे क्या मिला चट्टानों से टकरा घायल हो के
    मुझ जैसे मानव - जिन्हें नहीं क़द्र उसके अस्तित्व की
    नदी के विस्तार अथवा उसकी मीठी कलकल की

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    1. Sanjay Makkad
      जो डर गया वो मर गया
      हौसले के आगे जीत है
      डर के आगे हरदम हार
      बस जीवन का इतना ही सार

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  5. खुद की तलाश ...खुद भी परेशान
    ...just awesome anita ji

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