नदी अपने जीने के लिए अपना रास्ता खुद निकालती है
खुद के लिए किनारे भी देखिये वो खुद ही तो संवारती है
आसमान से उसे कब कहाँ कोई भी है उम्मीद
पर आसमान की छवि को भी वो खुद में निखारती है
वो मनमौजी मनचली अपनी राह पर ही तो चली
मंज़िल के लिए कब वो पैर घर से बहार निकालती है
ज़मी की उम्मीद में बहती हुई उसकी ज़िन्दगी
पर राह में कुछ जिंदगियां भी तो वो संवारती है
बदलना समय के अनुरूप कोई नदी से सीखे
हर क्षण उसी जगह वो खुद को बदल डालती है
अजीब सी है उसके अपनाने और भरने की प्यास
कितनी भी भरी हो, खुद को और भर देना चाहती है
उसके संकल्प और दृढ़ता की क्या कोई बात करे
अपनी जिद्द से वो राह के चट्टानों को भी तोड़ डालती है
पर इस नकचढ़ी के साथ चलो तो इसे मंज़ूर
विपरीत दिशा में चलने से ये भी अड़चने डालती है
खुद की तलाश में वो खुद भी तो है परेशान
पर ज़रूरतों के लिए ये कई बार खुद को मारती है
घर छोड़ने पर वापस आना कहाँ सम्भव हुआ है
ये विचार भी तो हममें एक बार ये ज़रूर डालती है
पहाड़ों से उतरी, कुछ प्यासी, कुछ व्याकुल सी
कैसे सागर से मिलते ही स्थिर सागर सी बन जाती है
खुद के लिए किनारे भी देखिये वो खुद ही तो संवारती है
आसमान से उसे कब कहाँ कोई भी है उम्मीद
पर आसमान की छवि को भी वो खुद में निखारती है
वो मनमौजी मनचली अपनी राह पर ही तो चली
मंज़िल के लिए कब वो पैर घर से बहार निकालती है
ज़मी की उम्मीद में बहती हुई उसकी ज़िन्दगी
पर राह में कुछ जिंदगियां भी तो वो संवारती है
बदलना समय के अनुरूप कोई नदी से सीखे
हर क्षण उसी जगह वो खुद को बदल डालती है
अजीब सी है उसके अपनाने और भरने की प्यास
कितनी भी भरी हो, खुद को और भर देना चाहती है
उसके संकल्प और दृढ़ता की क्या कोई बात करे
अपनी जिद्द से वो राह के चट्टानों को भी तोड़ डालती है
पर इस नकचढ़ी के साथ चलो तो इसे मंज़ूर
विपरीत दिशा में चलने से ये भी अड़चने डालती है
खुद की तलाश में वो खुद भी तो है परेशान
पर ज़रूरतों के लिए ये कई बार खुद को मारती है
घर छोड़ने पर वापस आना कहाँ सम्भव हुआ है
ये विचार भी तो हममें एक बार ये ज़रूर डालती है
पहाड़ों से उतरी, कुछ प्यासी, कुछ व्याकुल सी
कैसे सागर से मिलते ही स्थिर सागर सी बन जाती है
Waah! Khoobsuurat ehsaas!
ReplyDeleteबहोत बढ़िया अनीता जी
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद सुशील जी
ReplyDeleteبہت اچھے
ReplyDeletewww.justlookon.com
No idea what you wrote .. wish I can understand Urdu .. but I can't .. sorry
Deleteनहीं है आसान नदी की राह चलना
ReplyDeleteचट्टानों को चीर के आगे को बढ़ना
कदम कदम पर हैं विषैले जीव
जो तोड़ देते हौसला, सिखाते डरना
नदी भी तो पछताती होगी ऐसी राह चल के,
उसे क्या मिला चट्टानों से टकरा घायल हो के
मुझ जैसे मानव - जिन्हें नहीं क़द्र उसके अस्तित्व की
नदी के विस्तार अथवा उसकी मीठी कलकल की
Sanjay Makkad
Deleteजो डर गया वो मर गया
हौसले के आगे जीत है
डर के आगे हरदम हार
बस जीवन का इतना ही सार
खुद की तलाश ...खुद भी परेशान
ReplyDelete...just awesome anita ji
Thanks a lot
DeleteGracias !
ReplyDeleteThanks a ton
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