सलीक़े से सज़ा मेरा घर पर दीवारों पर नमी हैं
अक़्ल के बाज़ार में जज़्बातों की कितनी कमी है
हर तरफ़ बिखरे लफ़्ज़ों
के इस जहाँ में
एहसासो पर शब्दों की
कितनी बेबसी है
हर पल बढ़ते इंसानों की
भीड़ में
इंसानियत कितनी सहमी
खड़ी है
अंत सबका कब सिर्फ़
बुरा ही हुआ है
डूबते सूरज की ख़ूबसूरती
बढ़ चली है
कोई कितना भी ख़ुद को
बहला ले वादो में डाले
हमने जाना ज़िंदगी हर मोड़ पर अकेले ही बढ़ी है
हमने जाना ज़िंदगी हर मोड़ पर अकेले ही बढ़ी है
No comments:
Post a Comment