Friday, 6 January 2017

न ज़िन्दगी में कोई ख्वाहिशें न ही कोई ख्वाब है

न ज़िन्दगी में कोई ख्वाहिशें न ही कोई ख्वाब है 
ऐ ख़ुदा अब तेरी कहाँ मुझे कोई भी दरकार है 

अब कुछ खोने का भी डर देख दिल से गया 
कैसे कहूँ तेरी बंदगी की चाहत मुझमेँ बरक़रार है

अश्क मेरे न जाने क्यूँ रोके से भी न रुक रहे 
जबकि दिल को समझा चुकी हूँ ये तेरी हार है

हर सच जानते हुए अपनाना इतना मुश्किल हुआ 
क्यूँ झूठ के चेहरे से हो गया मुझे बेइन्तिहाँ प्यार है 

कुछ वक्त ने था दिया वो भी तूने ले लिया 
कैसे कहूँ तू नहीं कोई और मेरा गुनाहगार है 

एक और अहसान कर तू ले ले अपनी ज़िन्दगी 
तेरी ही तरह मुझे इससे भी नफरतें हज़ार है 



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