हर एक की ज़िंदगी में अनगिनत कहानियाँ होगी और अनगिनत कहानियों में हम सब ऐसे पात्र भी जिसे लगा लोग समझ
नहीं पायें या हम समझा नहीं पाये। अगर कुछ समझे भी तो सही रूप में तो नहीं ही समझे।
मेरी भी ज़िन्दगी हर इंसान की ज़िंदगी की तरह कहानियों से भरी पड़ी है। कहानी का ही तो एक नाम संस्मरण भी है।
कभी हम कहानी में संस्मरण खोजते हैं और कभी संस्मरण को ही कहानी का नाम दे देते
हैं। आज पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो सब एक किताबी कहानी सी लगती है। पर वो कहानी
जहाँ पात्रों को दूर से नहीं देखा था, पात्रों को जीया है।
सोचा अब ब्लॉग पर समय
निकाल कुछ संस्मरण भी लिखना शुरू ही कर दूँ। किसी और के लिए नहीं ख़ुद के लिए, ख़ुद के लिए
ही, ताकि ख़ुद को याद दिला सकूँ कि मैं भी कभी चीज़ों को कितना ग़लत लेती और समझती थीं। कोशिश होगी छोटे-छोटे भागों में लिखू, उन छोटी-छोटी घटनाओं को वैसे ही प्रस्तुत
करूँ। पर पहला संस्मरण कितना भी छोटा लिखूँगी वो कुछ बड़ा होगा ही। कुछ समझाना
होगा, जैसे ख़ुद नहीं समझती थी यक़ीं है बहुत होंगे जो नहीं समझते होंगे।
‘रानी’ इस शब्द के साथ सबके अपने अपने रिश्ते होंगे और जिसका कोई रिश्ता भी ना हो, उसे भी इसका मतलब तो पता ही होगा। पर शब्द भी माहौल और स्थान के अनुरूप मतलब बदलता है। एक समय था इस शब्द से मुझे चिढ़ थी। लगता रानी यानी महारानी, पर अब इस शब्द के
साथ एक श्रद्धा है। किसी का अत्यधिक प्यार-दुलार छुपा है। जैसे ही ये नाम या शब्द किसी
से सुनती हूँ किसी के बेइंतिहा प्यार की याद आती है।
जब शादी के बाद ससुराल पहुँची तो हर तरफ़ से एक ही शब्द कान में पड़ता था ‘कनियाँ’। मिथिला (मिथिला उत्तर बिहार का वो भाग है जहाँ
मैथिली बोली जाती है) में नई नवेली दुल्हन को कनियाँ ही बोलते हैं। पर दुल्हन यानी घर की बहू पुरानी भी हो जाए तो भी अपने से बड़ों के लिए कनियाँ ही रह जाती है। कनियाँ खाना खलथिन (कनियाँ ने खाना खाया), कनियाँ के माँ के फ़ोन आयल छैय (कनियाँ की माँ का फ़ोन आया), कनियाँ के पास के छैय (कनियाँ के पास कौन है), कनियाँ! कनियाँ! अचानक एक नया माहौल और नाम भी सिर्फ़ पतिदेव लेते थे। किसी की काकी थी, किसी की मामी, किसी की भाभी और बाक़ी सबके लिए कनियाँ। लगा अचानक इतनी बड़ी कैसे हो गई हूँ? मायके में तो बस दीदी या अनिता थी। पर बहुत जल्दी ही मुझे कनियाँ समझ आ गया और कनियाँ ख़ुद को मान भी लिया।
शादी के कुछ ही दिनों बात
छोटी ननद ने मेरी सास से पूछा, 'माँ कनियाँ के नाम की रखले छैय (माँ कनियाँ का
क्या नाम रखा है)?' नाम! चौक गई। नाम है न
मेरा अनिता, हाँ डैडी ‘अनु बेटा’ बुलाते हैं,। याद नहीं कभी उन्होंने सिर्फ़ अनु
बोला होगा, अनिता ध्यान है कई बार बोला था। पर नाम की क्या ज़रूरत! अभी सवाल ज़हन
में गूँज ही रहा था, कि सास की आवाज़ सुनाई दी ‘रानी’। बिना समय गँवायें तपाक से
सास का जबाब था मेरी छोटी ननद को । ननद ने भी कह दिया, 'नीक नाम छैय (अच्छा नाम
है)'। घर में सब मैथिली बोलते थे मैथिली तब मुझे बोलनी नहीं आती थी और बड़ों की
कोशिश होती मैं मैथिली ही बोलूँ। कुछ माहौल का कारण और कुछ अपनी मैथिली के कारण
बड़ों से जल्दी बात नहीं करती। मेरे नए घर के संगी-साथी सब बच्चें ही थे। सबसे
बेधड़क बात करती और ज़रूरतें भी उन्हीं से पूरी होती। पर तब तक छोटी ननद से बातचीत
का सिलसिला कुछ बन गया था वैसे भी वो थी जो बार बार आ कर बताती, क्या करना है। मिथिला
के विधि-विधान मुझे बताने, सिखाने और समझाने में हमेशा लगी रहती थी।
हर वो रीति-रिवाज जो ससुराल
में मिथिला में किए जाते हैं मुझसे भी करवाये गए और छोटी दीदी यानी मेरी छोटी ननद
ही मुझे वो सब बताती। तो बिना सोचे या ये कहिए बिना दिमाग़ लगाए ही उस समय मैंने
भी छोटी दीदी से पूछ ही लिया, दीदी नाम क्यूँ? मेरा नाम क्यूँ नया होगा? ननद कुछ
बोलती उससे पहले सास का जबाब आ गया, ‘एकरा इहों नहीं बुझल छैय (इसे अब ये भी नहीं
मालूम है)’। ससुराल में अब तक सब मान चुके थे कि मुझे मिथिला के रीति-रिवाज
ज़्यादा मालूम नहीं थे। अपनी हरकतों और बातों से मैंने अपनी अज्ञानता लोगों तक
पहुँचा दी थी। ननद ने समझाया मायके का नाम ससुराल में नहीं लिया जाता, ससुराल में
लोग दूसरे नामों से बुलाते हैं। मन में सोचा कितने नामों से, नाम तो वैसे भी कोई कहाँ लेता है। तरस गई हूँ कोई अनिता बुलाए, ‘अनु बेटा’ का तो सवाल ही नहीं उठता।
पर सास का रानी और वो
भी कुछ ऊँचे स्वर में बोलना कुछ खटक गया था। ऊपर से शादी से पहले कई रिश्तेदारों
को बोलते सुना था। अनिता के सास पूरा मिथलाँग छथि (अनिता की सास पूरी मिथिला के नियमों वाली है; मिथलाँग, अजीब होते हैं कुछ शब्द, मिथिला के ही लोग ख़ुद के लोगों
के लिए इसे प्रयोग में लाते हैं, मतलब कि मीन-मेख से नियम पालन करने वाले); अरे,
मधुबनियाँ सब अहने होई छैय (अरे मधुबनी के लोग ऐसे ही होते है)। मम्मी को भी एक
बार दुखी होकर बोलते हुए सुना था, अनिता हर रीति-रिवाज से भगाती थी उसी के सर सब
पड़ गया है। दीदी की शादी भी मिथिला वाले से ही हुई थी, पर हर चीज़ शॉर्ट-कट में,
दीदी की चौठारी भी ससुराल में हुई थी (मिथिला की शादी बहुत लम्बी होती है, बिना
चौथे दिन के जिसे चौठारी बोलते हैं शादी पूरी नहीं होती)।
मेरी विदाई के शायद पाँचवें
ही दिन मेरे ससुराल में पूजा रखा गया था। मम्मी भी आई थी। मुझे कुछ असामान्य नहीं
लगा, पर बाद में छोटी बहन का फ़ोन आया था, मम्मी पूरी रात रो रही थी, उन्हें
उम्मीद नहीं थी कि अनिता घूँघट कर सकती है। पूजा पर भगवान के सामने घूँघट में गई
थी। जेठ, ससुर सब सामने थे, मुझे रिश्ते समझा दिए गए थे, और हर रिश्तें के साथ कुछ
नियम लागू थे। हर रिश्ता अपने डूज़ एंड डोंट (do’s and don’t) यानी ‘क्या करें और
क्या नहीं करें’ साथ ले आया था। कोशिश हो रही थी चीज़ों को समझने की। पर परेशानी तो
होती थी साड़ी पहने की आदत नहीं थी, पर लोग कहते बहुत अच्छी तरह संभाल लेती हो।
कैसे बताती की इन साड़ियों में एक दर्जन पिन लगे हैं। लोग लम्बा घूँघट खींच देते
और मैं उसे माथे तक किसी ना किसी हरकत से ले आती।
पर सबसे अजीब लगता जब
कोई मुझे देखने आता और मेरा लम्बा घूँघट कर दिया जाता और फिर उसके सामने घूँघट हटा
उसे मेरी शक्ल दिखाई जाती और उस समय मुझे आँख बंद करना होता। लगता नई तो मैं हूँ
इस घर में, मुझे लोगों से परिचय करवाना चाहिए, आँखें मुझे खोलनी चाहिए उल्टा मुझे ही
आँखे बंद करने को कहा जा रहा है। छोटी दीदी को एक बार बोला भी, 'दीदी मेरा भी मन
करता है देखूँ कौन मुझे देखने आया है, आँखे खोलने का मन करता है।' दीदी ने ये बात
घरभर में सबको बोल दी। हर किसी के मज़ाक़ का विषय बन गई थी मेरी वो उत्सुकता। उस
दिन से दीदी से बात करते हुए कुछ सावधान हो गई, मालूम नहीं मेरी कौन सी बात फिर
मज़ाक़ बन जाए। पर कई बार जब आभास होता लोग निकल रहे हैं उससे पहले ही आँखे खोल
लेती, लगता देखूँ तो सही कौन था जो मुझे देख ये कमेंट कर के गई या गया। अजीब-अजीब
कमेंट होते मेरी सूरत पे। अरे दोनों भौ के बीच ये कटा हुआ क्या है! माँ बताती, हाँ बचपन में स्कूल में गिर गई थी, उसी
का दाग़ है। मन में सोचती शुक्र है घुटने नहीं दिखाने पड़े, बचपन में बहुत शरारत
करती थी, बहुत साइकल चलाया है, उससे गिरी हूँ, नानी गाँव में पेड़ों पर ख़ूब चढ़ती
थी और बहुत गिरी हूँ। स्कूल की गरमियों की छुट्टी भर मेरे दोनों घुटने घाव से भरे
होते थे, घाव तो सब भर गए पर बहुत दाग़ आज भी मौजूद हैं।
कई लोग मुझे देखने रूम
में आ सकते थे और कई के लिए मुझे रूम से बाहर जाना होता और बाहर जाना तो और भी
अजीब होता, मुझे ज़मीं पर चुक्की-माली हो कर बैठना पड़ता, मैं पहले तो समझ ही नहीं
पाई ये बैठना कैसे था। ज़मीं में नील-डाउन (kneel-down - घुटने धरती पर और पंजे
पीछे जिस पर शरीर का भार होता) कर बैठती। स्कूल में यही सीखा था। पर सास हमेशा
पीछे से ठुनकी मारती, ‘ये ठीक से बैठूँ ना, कथी ठेहूनिया मार के बैसेछि (ठीक से
बैठो, क्या घुटनों के बल बैठी हो)’। पर मैं वैसे ही बैठती और फिर उठ कर अंदर आ
जाती। फिर जब ये दो तीन बार हुआ तो छोटी दीदी से पूछा, दीदी ये ठीक से बैठना क्या
होता है? फिर उन्होंने कहा ठीक से बैठना यानी चुक्की-माली में बैठना और जब
उन्होंने चुक्की-माली का मतलब बताया, तो लगा नहीं मैं ऐसे नहीं नीचे बैठूँगी। मुझे
नहीं बैठना इस तरह से। कुछ ही देर बाद सास और बड़ी ननद कमरे में आई, सोचा यही
मौक़ा है। बोला माँ मैं चुक्की-माली में नहीं बैठूँगी, उस तरह तो लोग पैखाना करते समय
बैठते हैं।
ये ससुराल में मेरा
पहला विद्रोह था उनके रीति-रिवाज के ख़िलाफ़। छोटी ननद ने बताया था कि मिथिला में
शादी में भी लोग ऐसे ही बैठते हैं। मैंने पर किसी को शादी में ऐसे बैठे नहीं देखा
था और देखा भी होगा तो याद नहीं मुझे। मुझे तो किसी ने नहीं टोका शादी में और ना ही बोला चुक्की-माली में बैठने को। बड़ी ननद मेरी बात सुन कुछ मुस्कुरा दी, पर माँ के
शक्ल पर एक अजीब सी शिकन थी, मालूम नहीं वो ग़ुस्सा था या नई नवेली दुल्हन का
इनकारनामा, उन्हें पसंद नहीं आया। पर सीधे तौर पर जवाब में उन्होंने कुछ नहीं कहा
और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई। पर लोगों का आना थोड़े रुकने वाला था? फिर कुछ देर
बात कमरे से बाहर मुझे बुलाया गया और मैं फिर घुटनों के बल ही बैठी। पर इस बार माँ
ने ठुनकाया नहीं और ना ही ठीक से बैठने को बोला। उल्टा मुझे देखने आई उन औरतों को ही
समझाया, इससे नहीं बैठा जाता उस तरह, चुक्की-माली में नहीं बैठ पाती है, ये
ठेहूनिया मार कर ही बैठती है। और उसके बाद जब भी कोई आए और सास पास हो तो एक बार
ज़रूर पहले ही बोल देती थी, ये इसी तरह बैठती है।
ठीक उसी दिन शाम को
छोटी ननद ने सास से पूछा था मेरे नामकरण के बारे में, लगा दिन में तो माँ कुछ बोल
नहीं पाई मुझे, पर ग़ुस्सा तो था ही उसे मुझसे। अभी तक मैं ये समझ चुकी थी इस घर
में कोई उनकी बात नहीं काटता, हर किसी की नज़र में उनके लिए एक इज़्ज़त थी। अपने
पति से भी अपनी माँ की तारीफ़ ही सुनी थी। लगा माँ ने ग़ुस्से में ये ‘रानी’ नाम
रखा है, शायद उनके बात नहीं मानने की सज़ा है। सास का रानी बोलना लगा जैसे वो रानी
नहीं मुझे महारानी बोल रही हो, वो भी जैसे फ़िल्मों में ताने मार कर बोला जाता है।
मेरी नासमझी पर चोट या शायद उनकी दुनिया जैसी नहीं दिखने की सज़ा। लगा शायद वो
मेरी हरकतों से परेशान हैं।
कोशिश होती उनकी बातों को समझूँ, पर आदत से मजबूर कभी कुछ पूछ ही लेती थी। पर ध्यान आया नानी-गाँव में भी
देखा था, नानी को मामियों को कुसुमरानी, फुलरानी बुलाते हुए और ये भी मालूम था ये उनके
ससुराल के नाम हैं। पर मैं तो इसे उनका असली नाम ही मान बैठी थी (छोटी मामी को छोड़
आज तक मामियों के असली नाम नहीं जान पाई हूँ)। कई बार लोग बहुओं को उनके गाँव के
नाम से भी पुकारते थे; सिहो वाली, बहरा वाली (मतलब उनके गाँव का नाम सिहो और बरहा
है)। मम्मी को भी कई लोग तितरा वाली बुलाते थे, तितरा मेरी नानी-गाँव का नाम है। पर
दूसरों की तकलीफ़ दिखाये नहीं दिखती है, दर्द तो तब होता है जब सही में ख़ुद को
कोई चोट लगे। ये ससुराल में जैसे मुझे पहली चोट लगी थी, लोगों के लिए बिलकुल
सामान्य पर मुझे दर्द हुआ था।
समय के साथ कुछ सास को
समझने लगी, पर आदत तो आदत है, सो सवाल-जवाब करने की मेरी आदत भी मेरे साथ रही, वो
भला क्यूँ मायके में छूटती? अब मैं सास के लिए लबड़ी (अत्यधिक बोलने वाली) थी।
सास की कई चीज़ें मुझे पसंद नहीं थीं , वैसे ही मेरी कई हरकतें मेरी सास को नागवार
थी। पर हम दोनों के बीच में मेरी पतिदेव हमेशा पुल का काम करते थे। माँ को कभी
सीधे जवाब नहीं देती थी, किसी को घर में नहीं देखा था देते हुए पर तर्क वो तो मैं
देती ही रहती थी। पर पतिदेव से हर बात बोलती, अपनी हर नाराज़गी बताती। ये भी
उन्होंने ही मुझे कहा था, अपनी बात नहीं बोलोगी तो घुट कर रहोगी, हर बात बोलो पर
सुनने की आदत भी डालो। उन्हें भी लगता कि मैं संयुक्त परिवार में नहीं रही हूँ इसलिए
शायद चीज़ों का मतलब ठीक से नहीं जानती हूँ। मेरे हर सवाल का उनके पास तर्क ज़्यादा
और जवाब कम होते। तर्क को तर्क से काटने की बहुत ही पुरानी बीमारी है, और कई बार
हम आपस में भी उलझ जाते थे। पर माँ को उनके मुँह पर जवाब शायद नहीं दिया कभी मैंने।
इसी तरह शादी के सत्रह
साल गुज़र गए। वक़्त को ना किसी की परेशानी से कुछ लेना है ना ही किसी के समझदारी
से कुछ, उसे अपनी रफ़्तार चलना है और वो बस चलता है। एक दिन हॉस्पिटल से घर घुसी
ही थी, डैडी की तबियत कुछ ज़्यादा ख़राब थी, डॉक्टर भी हताश हो चुके थे। घर में घुसी
और माँ ने पूछ लिया, ‘बूढ़ा के की हाल छैथ (बूढ़ा का क्या हाल है)? माँ मेरे डैडी
को बूढ़ा बुलाती थी और ये मुझे कभी भी पसंद नहीं था। माँ से पर कभी नहीं कहा था पर
पतिदेव का ज़रूर बोलती, और वो वही अपने तर्क से मुझे चुप करते, मिथिला में लोग इसी
तरह अपने समधी को सम्बोधन करते हैं, कोई अजीब शब्द नहीं है, इसमें भी प्यार और
अपनापन है। दिल नहीं मानता था पर दिमाग़ को समझा देती थी।
पर उस दिन मन पहले से
ही उखडा हुआ था, उनके सवाल सुनते ही बिदक पड़ी थी, ‘की माँ ई की बूढ़ा बूढ़ा कहिछी,
नाम नहीं ल सकई छी त कमसे कमसे इ त कहैए साकैछि, अहां के बाबूजी या पिताजी के की
हाल छैय, अहिं तो कहैछि की डैडी के उम्र बड़का ओझा के उम्र लगभग एक अछि (माँ ये
क्या बूढ़ा बूढ़ा लगा रखा है, अगर नाम नहीं ले सकती हो तो इतना तो कह ही सकती हो तुम्हारे
पिताजी का क्या हाल है, आप ही तो कहती हो डैडी और बेड़े ओझा, यानी उनके बड़े
दामाद की उम्र लगभग एक ही है)।
पहली बार माँ के चेहरे
पे एक अजीब सा दर्द दिखा। माँ उनमें से नहीं थी जो चीज़ों या बातों को चुपचाप
मान लेती, उन्हें जवाब देना आता था और
बहुओं को तो ख़ास कर। कुछ देर के लिए मैं भी घबरा गई, बहुत कम ही माँ का ये रूप
देखा था, पर ऐसा तभी होता जब सही में बात उनके दिल में लगती। लगा मालूम नहीं कितना
बड़ा पाप कर दिया है। इतनी बुरी बात तो नहीं बोली थी, इससे पहले भी कई बार इस तरह
या इससे भी ज़्यादा बोल चुकी हूँ उनको। पर हर बार उनका कुछ जवाब होता और फिर मेरा।
पर उनकी ख़ामोशी अब चुभ रही थी, लगा बहुत बड़ी ग़लती हो गई। किसी को हराने में भी
तभी मज़ा आता है जब वो जीतने की कोशिश कर रहा हो, जो ख़ुद हार मान ले उसे देख दया आती है। उस वक़्त ख़ुद की जीत का ख़याल कहा रहता है, लगता है पहले इसे लड़ना
सिखाना होगा।
ख़ुद को सम्भाला और फिर
उनके पास जा हिम्मत कर पूछा, ‘की भेल माँ’ (माँ क्या हुआ)? उन्होंने शांति से पर
बहुत ही दर्द भरे स्वर में जवाब दिया, ‘एहन बात छैल त पहले किया ना कहलियी (ऐसी
बात थी तो पहले क्यूँ नहीं कहा)’। क्या कहती, कहा था बहुत बार पर आपको नहीं आपके
बेटे को, और उन्होंने हर बार मुझे समझा दिया। चाह कर भी आपको नहीं बोल पाई। बोलना
चाहती थी, मुझे बुरा लगता है कोई मेरे डैडी को बूढ़ा बोले। डैडी मेरे लिए हमेशा डैडी थे, किसी को भी उन्हें उसी तरह से देखना चाहती थी। वैसे भी लड़कियाँ मायके
की बुराई कहाँ सुन पाती है, ससुराल के लोगों से तो कभी नहीं। पर उस दिन एक बात तो
सीख ही लिया था, माँ की बातों को समझने के लिए मुझे मेरी पतिदेव की ज़रूरत नहीं
थी। उन्हें मैं सीधे अपनी बात बोल सकती थी, पूछ सकती थी, समझा सकती थी। उस दिन के बाद
माँ ने कभी भी डैडी को बूढ़ा नहीं कहा। अब डैडी 'रानी के बाबूजी' हो गए थे। पर इस
घटना ने हम दोनों को एक दूसरे के बहुत क़रीब ला दिया था। अब मैं घंटो-घंटो माँ से
बातें करती। उनके बचपन की कहानियाँ जानना चाहती, उनकी हर छोटी बड़ी बातों में मुझे
अब दिलचस्पी थी। उनकी ज़िंदगी जानना चाहती थी जो उन्होंने जीया था।
एक बार ऐसे ही क़िस्सों
कहानियों की बात चल रही थी और मैंने उनसे पूछ ही लिया, ‘माँ हमर नाम रानी किया
रखलियी (माँ मेरा नाम रानी क्यूँ रखा)? जानना चाहती थी कि क्या था उनके मन में, क्या सोच उन्होंने रानी रखा और उनका जवाब सुन मैं चौक गई। बोली जब तुम्हें पहली
बार देखा तो लगा कोई राजकुमारी है, तुम्हें राजकुमारी तो बोल नहीं सकती थी, मेरे
बेटे से शादी जो हो रही थी, इसलिए रानी बोला, तुम मेरी रानी हो। अपनी अक़्ल पर
शर्म आ गई। पर मैंने भी अपनी हर सच्चाई माँ को बताई। हर बात पूरे घटना क्रम के साथ और अपनी सोच भी। उनका हँसते-हँसते बुरा हाल था, हँसते-हँसते ही वो बोली ‘अहां बतही
के बतही ही रहबै (तुम बेवक़ूफ़ की बेवक़ूफ ही रहोगी)।
उन्होंने राजकुमारी को
रानी बोला और मैंने रानी तो महारानी सोचा। कितना अंतर था हमारी सोच में। काश उसी समय पूछ लिया होता। इतनी नफ़रत
नहीं होती तब मुझे इस नाम से। कई बार माँ रानी रानी पुकारती तो मैं अनसुना करने का
नाटक करती, जैसे समझ ही नहीं रही हूँ किसे बुला रही है। फिर बोलती तो कहती हाँ समझ
नहीं पाई आप मुझे कह रही हैं (यानी मुझे इस नाम की आदत नहीं है)। कभी कोई ननद रानी
बोलना भी चाहती तो टोक देती, दीदी मेरा नाम अनिता है अनिता बुलाओ। सब मान भी जाते
और धीरे-धीरे माँ को छोड़ हर कोई अनिता ही बुलाने लगे।
माँ बहुत समझदार थी। बहुत बातें है उनकी और मेरी जो समय के साथ लिखूँगी। वो दुनिया को उसके नए रूप में
अपनाने को हमेशा तैयार रहती। बेरासी साल में भी वो ख़ुद को बदलने के लिए तैयार थीं,
नहीं, अपनी बेटी के लिए नहीं अपनी बहु के लिए। लिखना जितना आसान है अपनाना उतना ही
मुश्किल है। इस घटना के कुछ दिन बाद ही डैडी गुज़र गए। डैडी के जाने के चार
महीने बाद माँ भी मुझे छोड़ कर चली गई। सच्चे रूप में उन्हें समझा, पर बहुत देर से। पर आज एक बात सोच कर चैन भी है, समझा और उन्हें बोल पाई, माँ मैंने आपको
समझा और जाना है।

Is it your own #Journey of life ? Or it is a concocted story , as I write ! The Pic you have shared is of daughter in law , father in law & mother in law ?
ReplyDeleteIf you read it, it is quite obvious that this is may own story and hundred percent true. The pic is of my father-in-law, mother-in-law and me. And this is a very casual snap which was taken at my native place but has many memories attached to it so I shared it.
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