हमने तो मन्नतों के लिए भगवान बदलते देखा है
चंद सिक्कों के लिए लोगों का ईमान बदलते देखा है
लोग शायद हमें पागल ही
मान बैठें
पर हमने इंसानो को सामान
बनते देखा है
झूठ की अनगिनत परतें और
उनपर क्या कहें
पर हमने ‘झूठ’ में बना ‘सच’
का पकवान देखा है
मौत के मुँह पर खड़ा फिर
भी कोई कैसे हाथ पसारे
बीच सड़क पर ख़ून से
लथपथ हमने वो इंसान देखा है
लोग जिसे अनदेखा कर हर
बार थे निकल चुके
हमने उन पत्थरों का भी
बेशक़ीमती सामान देखा है
हम सोचते थे दुनिया में
अपने जैसे सिर्फ़ हम हैं
हमने अपने जैसा भी हू-ब-हू
एक इंसान देखा है
हम जानते हैं घरों के
क़िस्से महफ़िल में सुनाया नहीं करते
पर इतना तो कहेंगे हमने
मेज़बान को मेहमान बनते देखा है
अपने देखने की अजीबो-ग़रीब दास्ताँ से क्या-क्या सुनायें
पर सच है हमने खुदा को
भी तन्हाई में शैतान बनते देखा था
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