ज़िंदगी कुछ तो ख़ुद में ही अजीब है और कुछ हम इंसानों ने इसे अपनी हरकतों से अजीबो-ग़रीब बना दिया है। कई बार आप
महफ़िल में शिष्टाचारवश सच नहीं बोल पाते हैं और अपनी एक झूठ के कारण फँसते चले
जाते हैं। अपनी ही बनाई कहानी के ऐसे पात्र बन जाते हैं जो फिर कहानी से निकल ही
नहीं पाता। पर ऐसा नहीं कि ऐसी कहानियाँ दुखांत होती हैं कई बार अंत सुखद भी होता
है। बस कुछ ऐसा ही मेरे साथ हाल ही में हुआ।
ट्वीटर पर एक अनजान से
व्यक्ति ने अपनी किताब का चित्र भेजा और कहा आप इसे पढ़ें। मैंने भी शिष्टाचारवश
हाँ कह दिया। कैसे कहती पढ़ने लिखने से बस ज़रूरतभर का ही नाता है। मजबूरी में ही
पढ़ती हूँ। नौकरी कर रही हूँ बिना जानकारी के जानकारी भी तो नहीं दे सकती। पर
पढ़ने से लगाव ही नहीं रहा। लोगों को यात्राओं में देखती हूँ किताब से चिपके हुए। अच्छी
आदत है, बुरा भी नहीं लगता, पर कई बार अजीब भी लगता है। कह तो कुछ नहीं सकती पर मन
में विचार एक बार तो ज़रूर आता है घर पर पढ़ लेना अभी तो यात्रा का आनंद लो। ये
दृश्य कोई किताब नहीं दिखा सकता। कोई तुम्हें ये अनुभव नहीं बताएगा कि चल तुम रहे
हो और लग रहा है दुनिया चल रही है। किताब के अनुभव लेखक के हैं अपने अनुभव भी तो
हासिल करो। अपनी आँखों से दुनिया देखो दूसरों की आँखों पर इतना मत भरोसा करो।
हवाईजहाज़ में भी कोशिश होती है कि खिड़की वाली जगह मिले। नहीं मिलती तो दुःख
होता है क्या करूँगी। ऐसे ही समय में कई बार रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे से किताब
भी ख़रीदी ख़ास कर जब अकेले यात्रा करती हूँ, पर पढ़ने के लिए नहीं, ख़ुद को लोगों
से बचाने के लिए। कई बार अपने आस पास के लोगों से बात करने का मन नहीं करता है।
अजीबों ग़रीब प्रश्न का सामना करना पड़ा है, शादी से लेकर तनख़्वाह तक पूछने में
लोगों को कोई हिचक नहीं होती। ऐसा है तो ऐसा क्यूँ? वैसा है तो वैसा क्यूँ? ये
नहीं किया वो नहीं किया? और कई तो ख़ास हितैषी अपने घर के वैद्य से लेकर अपने हज़ाम
तक का नम्बर देने को तैयार हो जाते हैं।
ऐसा नहीं कि बातें करना
पसंद नहीं है मुझे जानने वाले लोग मुझे बातूनी ही कहते हैं। पर अनजान लोगों से
व्यक्तिगत बातें एक सीमा के बाद नहीं करना चाहती हूँ और इस समय किताब सही में ढाल
का काम करती है। कई बार बुद्धिजीवी भी नज़र आना ज़रूरी है। बस किताब मेरे रास्ते का
ही हमसफ़र होता है। पहला पन्ना पढ़ा अंतिम पन्ना पढ़ा और बीच में उल्टा पुल्टा हो
गया मेरा पढ़ना। फिर घर में वो किताब कहाँ गई, कहाँ रखा कोई मतलब नहीं। कई बार कुछ
साथियों ने कहा आप ये किताब पढ़िये आप पक्का पूरा पढ़ेंगी। अपको छोड़ने का मन ही
नहीं करेगा आप पक्का पूरा का पूरा पढ़ लेंगी (कुछ लोगों को मेरी परेशानी का ज्ञान
है)। किताब भी मँगवाई पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ, कभी पढ़ने में रुचि ही नहीं जागी या
यूँ भी कह सकते हैं कोई किताब नहीं मिली जिसे पूरा पढ़ने का मन करता। पतिदेव हमेशा
कहते रहते हैं। अगर लिखना शुरू किया है तो पढ़ना सीखो। लिखने का पहला क़दम पढ़ना होता है। पर मुझे तो शायद छलाँग
लगाने की आदत है। लोगों को कहती हूँ तो वो आज भी हैरान होते हैं और कुछ मानते ही
नहीं, कई बार परीक्षा से एक दिन पहले ही किताब ख़रीदी। परीक्षा देना था इसलिए, नहीं
तो ख़रीदती भी नहीं। शायद स्वभाव में धैर्य है ही नहीं, धीरज इस शब्द का इस्तमाल
लिखने में ही नहीं ज़िंदगी में भी मुझे करना बहुत ज़रूरी है।
हाँ तो अपनी कहानी
ट्विटर पर आती हूँ। सोचा था वो जनाब भी भूल ही जाएँगे कि उन्होंने मुझे किताब के
लिए कहा था। पर कुछ दिनों बाद श्री राजीव बक्शी जी का फिर से ट्वीट आया, क्या आपने
मेरी किताब देखी? कहाँ मिलेगी उन्होंने ये भी बतला दिया। समझ नहीं पाई क्या कहूँ?
हाँ तो पहले कह दिया था अब किस मुँह से ना कहती। सो फिर कह दिया हाँ पढ़ूँगी। पर
जितनी बार राजीव जी का ट्वीट नोटिफ़िकेशन में दिखता एक आत्मग्लानि होती। मैंने कहा
है पढ़ूँगी और अभी तक किताब मँगवाई ही नहीं है और फिर एक दिन राजीव जी से पूछ ही
लिया, क्या किताब ऑन लाइन मिलेगी? और उनका जबाब भी आ गया, हाँ, किताब ऑन लाइन मिलती
है। पर मैं भी आलसी नम्बर वन, घर पर सोचती ऑफ़िस में समय मिल जाता है वही से बुक
कर दूँगी और ऑफ़िस में सोचती घर में समय निकाल लूँगी वही से ऑर्डर कर दूँगी। इस
उधेड़-बुन में भी लगभग दो सप्ताह निकल गये। पर एक दिन सही में ख़ुद पर ग़ुस्सा आ
गया जब राजीव जी का एक ट्वीट अपनी एक कविता ‘डैडी’ के संदर्भ पर देखा। लगा क्या कर
रही हूँ, झूठ कि भी एक सीमा होती है और मैंने तो झूठ की लक्ष्मण रेखा भी पार कर ली थी । तुरंत किताब ऐमज़ॉन पर ऑर्डर किया और राजीव जी को ट्विटर पर DM यानी सीधा
मैसेज किया की आपकी किताब का ऑर्डर दे दिया है। उनसे क्षमा भी माँगी कि अपने आलस
के कारण ऑर्डर नहीं कर सकी थी।
पर डर अब भी मन में बना
था, ट्वीटर पे किताब देखी थी पर जानने की कोशिश नहीं की थी कि किताब कितनी मोटी
है। मोटी किताबों से डर लगता है। स्कूल का वो डरावना स्वप्न 'परीक्षा' ध्यान आ जाता
है। पतली किताब तो पढ़ी नहीं जाती और मोटी किताब कैसे पढ़ूँगी। लगा क्या फिर से
झूठ बोलूँगी। क्या हुआ बोल दूँगी, अच्छा है। सब तो यही बोलते हैं, वैसे भी मुझे तो
हर लिखा हुआ अच्छा ही लगता है, ठीक ठाक तो बोल ही सकती हूँ। कल शाम किताब हाथ लगी तो
जान में जान आई। किताब मेरी आशा से कहीं अधिक पतली थी, उत्सुकतावश पन्ने पलटे तो
भाषा भी अत्यंत सरल। आजकल जो थोड़ा बहुत कभी कभार
कोई लेख पढ़ा तो पता नहीं क्यूँ लगता है लोग बताने को कम और अपनी विद्वता
दिखाने को ज़्यादा लिखते हैं। जितने शब्द स्कूल से ले कर सीखें हैं या आतें है
लगता है उनका इस्तमाल कर ही लिया जाए। पर इसमें कुछ मानसिकता शायद मेरी भी है ख़ुद
को बदल रही हूँ। अंग्रेज़ी के कठिन शब्द को शब्दकोश में खोजा और हिंदी को छोड़
दिया। भाषा प्रयोग से ही निखरती है। और जब तक शब्द का ज्ञान नहीं वो कठिन और जिस
दिन मतलब जाना लगा हम ही अज्ञानी थे, पूरी दुनिया तो इसे प्रयोग में ला रही है।
आज जब सुबह उठी तो फिर
राजीव जी का ट्वीट नोटिफ़िकेशन में दिखा। पहली बार आत्मग्लानि से मुक्त थी। किताब का
एक फ़ोटो बिस्तर पर ही खींच लिया और ट्वीट कर दिया। लीजिए आपकी किताब मेरे पास है।
पर कोई भी कहानी बिना
क्लाइमैक्स थोड़े ही ख़त्म होती है। राजीव जी का अगला फ़रमान आया आप किताब का
रिव्यू यानी समीक्षा हिंदी में भेजिएगा। हिंदी ये तो मेरी पसंदीदा भाषा है। ठीक
ठाक लिख भी लेती हूँ, ग़लतियाँ! वो तो मेरे जनम जनम की साथी हैं छापना होगा तो
प्रूफ़ रीडर होगा ना ब्लॉग में सब चलता है। पर समीक्षा? क्या बोलती, किताब तो ठीक से
आज तक किसी की पढ़ी नहीं और समीक्षा कैसे करूँगी, लिख दिया समीक्षा नहीं पर अपने
विचार तो दे ही सकती हूँ। बोल तो दिया पर दिमाग़ में दुनिया भर के सवाल कौंधने
लगे। अपने अंदर झाँका तो स्कूल याद आ गया। सिर्फ़ परीक्षा के लिए पढ़ती थी, लगा कोई
कह रहा हो ‘अनिता, तुम्हें पढ़ना होगा परीक्षा के लिए, नहीं तो फ़ेल हो जाओगी, लोग
हँसेंगे अगर नम्बर कम आए।
पर पता नहीं क्यूँ सुबह
से ही बहुत ज़्यादा स्कूल याद आ रहा है। मुझे आज भी याद है अपनी छोटी बहन पर रौब
झाड़ने के लिए कई बार कहती थी, तुझसे इतना नहीं पढ़ा जा रहा जब हमारी जगह आएगी तो
क्या करेगी? देख हमें इतनी मोटी मोटी किताबें पढ़नी पड़ती हैं। हर बार अपना ख़ौफ़
उसके चेहरे पर देखना चाहती थी और कई बार बिचारी सच में डर जाती थी। इतिहास मुझमें
कभी भी स्कूल में रुचि नहीं पैदा कर पाया। ग़ुस्सा आता था जिसे मरना है मर गया, क्यूँ हमारे पढ़ने के लिए इतना छोड़ गया। और मुझे क्या लेना अकबर क्या पढ़ता था, क्या खाता था या कहाँ रहता था। उसका आज के ज़माने से क्या लेना! इतना ज्ञान नहीं
चाहिए। ज़िंदगी जीने की बात कीजिए ज़िंदा लोगों की बात, मुर्दों की नहीं। वो बात
और है कि केमिस्ट्री के फ़ार्मुले और फ़िज़िक्स के डेरिवेशन अभी भी किसी काम के नहीं
और जीव विज्ञान के वो वैज्ञानिक नाम सिर्फ़ परीक्षा तक याद रहे।
पर जब आज सोचती हूँ तो
अजीब लगता है। आज हालात बिलकुल उलट हैं। अब इतिहास में रुचि है, जानना चाहती हूँ कि
ये इमारत यहाँ क्यूँ खड़ी है, क्यूँ किसी को इतनी भव्य इमारत बनाने की ज़रूरत पड़ी।
हिंदुस्तान में मुसलमानों ने इतने साल शासन किए, फिर भी कैसे भारत में आज भी इतनी तादात में हिंदू बचे हुए हैं? इतने क्रूर राजा के होते हुए भी हम कैसे अपनी धरोहर
को बचा पायें हैं? और तो पारसी क्यूँ नहीं अपने देश में बच पाए, क्यूँ उनके देश
में अब सिर्फ़ मुसलमान हैं और वो मुट्ठी भर बस भारत में? ऐसे अनगिनत सवाल दिमाग़
में आते हैं और तब ख़ुद को कोसती हूँ, जब पढ़ने का मौक़ा मिला तो पढ़ा नहीं और अब
इतिहास को जानना चाहती हो! कभी जानने का मन भी किया और कोई किताब गूगल पर खोज कर
निकाला तो किताब की मोटाई देख डर गई। बाप रे बाप कौन पढ़ेगा। महान हैं वो लोग जो
इतना पढ़ लेते हैं। हाँ कोई पढ़ा लिखा हो तो उससे दोस्ती करने का मन करता है कोई
इतिहास का जानकार जो मुझे बिना पढ़े समझा दे, जो मेरे कुछ प्रश्नों का जबाब दे सके।
आज लगता है बहुत बड़ी
कमी है हमारी शिक्षा प्रणाली में। हमने शिक्षा को ज्ञान बना दिया है और उसपर मोटी
मोटी किताबों का बोझ रख दिया है, और परीक्षा के नाम पर उसे बच्चों पर थोप रहे हैं।
वैसे भी शिक्षा तो थोपी ही जा रही है। ज्ञान ख़ुद में भी तो एक भ्रम या मिथ्या है।
शिक्षा एक जानकारी है और उसे उसी प्रकार होना चाहिए था, एक निरंतर चलने वाली
प्रक्रिया जिसमें बच्चों की जिज्ञासा बनी रहे, परीक्षा हो भी या ना हो। और इस जानकारी में मोटी किताबों से कहीं ज़्यादा सिखाने वाले के अनुभव शामिल हों। काश स्कूल में ये जानकारी पाने की जिज्ञासा बनी रहती तो कितना कुछ सीखा होता जाना होता। इतिहास में भी तब रुचि होती। पर लगता है अभी भी बच्चों का वही हाल है। बिचारे
बच्चें करे भी तो क्या? बड़ों की दुनिया में उनकी सुनता कौन है?
राजीव जी, शुक्रिया, आज
आपके कारण फिर से स्कूल में हो कर आई हूँ। पर अब परीक्षा का डर चला गया। देखिए
सुबह से जो दिमाग़ में घूम रहा था उसे लिख दिया। आपमें सिर्फ़ लिखने की ही नहीं
लिखवाने की भी क्षमता है। आपसे वादा है आपकी किताब पढ़ूँगी और आपको अपने विचार भी
लिखूँगी। पर समीक्षा नहीं दूँगी, परीक्षा का डर नहीं रहा पर देने का भी मन नहीं
हैं। ज़िंदगी जीने के लिए मिली है बिना डर के, बच्चों के लिए तो कुछ नहीं कर सकती
पर ख़ुद अब ज़िंदगी में कोई परीक्षा नहीं दूँगी, किसी तरह के दबाब में तो क़तई नहीं।
पर कहा ना आलसी हूँ और थोड़ी व्यस्त भी,
पर पढ़ कर ही कहूँगी अपनी बात। अब तो आप भी मुझे कुछ जान ही गए होंगे जैसे मैं अब
आपको पूरी तरह जान गई हूँ। लिखना लिखवाना दोनों एक कला है और आज आप लिखवाने में
डिस्टिंक्शन के साथ पास हुए हैं। पर आज ख़ुद से भी वादा है पढ़ूँगी धैर्य के साथ। कौन
सी! किसी के पास कोई राय है तो बताए, पर शुरुआत हो गई ‘Journey from Guwahati to
Machhiwara’ शायद मेरी भी जर्नी यानि यात्रा बने किताबों की दुनिया के लिए।
तहे दिल से शुक्रिया राजीव जी।
Wow !
ReplyDeleteThanks a lot the next would follow soon ....means part two :)
DeleteNice
Deleteआपका यह लेख पढ़कर आज आपकी कई व्यक्तिगत कमजोरियों को भले ही जान लिया हो, पर अच्छा लगा कि आपने साफगोई से अपनी बातें लिखी हैं. वास्तव में पढना और लिखना कई बार बहुत कठिन हो जाता है. कई बार तो मन रहते हुए भी समय की दिक्कत रहती है. मेरी भी व्यक्तिगत दिक्कत है कि जल्दी लिखने के लिए मन तैयार नहीं हो पाता है, लेकिन जब लिखने लग जाता हूँ तो कई बार बहुत अच्छा लेखन हुआ है. यात्राओं में पढने के बारे में मेरा भी बिलकुल आपके जैसे ख़याल हैं. लेकिन कभी जरूरत रही तो जरूर पढ़ी है. कई बार तो मैंने सम्पादन का कार्य अपनी यात्राओं में किया है.
ReplyDeleteआपने इस लेख में स्कूली बच्चों से सम्बंधित जो बातें लिखी हैं, वो बहुत ही मौजू हैं. इस विषय पर आप अलग से विस्तार से लिख सकती हैं.
वैसे किसी किताब पर समीक्षा लिखने की बात है तो प्रायः बड़े - बड़े लेखकों से संपादकगन इसी तरह तकाजा कर लिखाया करते हैं. श्री राजीव जी आपसे लिखवा लें तो यह एक बड़ी बात होगी. हमें उत्सुकता रहेगी कि आप क्या लिखती हैं. जल्द लिख डालिये.
शुक्रिया अशोक जी .. कोशिश तो होगी की लिखूँ राजीव जी की किताब पर .. पर कब मालूम नहीं ... बस कुछ ख़्याल आया लिख दिया ..सही में मन करता है बच्चों के लिए कुछ करूँ .. पर जानती हूँ कुछ नहीं हो पाएगा .. सही में विस्तार से लिख सकती हूँ और लिखूँगी भी .. पर कुछ हो पाएगा .. ये सोच निराशा होती है ..पर विचार का आदान प्रदान तो हो ही सकता है जैसे अभी आपसे हुआ .. शुक्रिया देखिए आपके विचार से भी अवगत हुई ।
Deleteबहोत बढ़िया अनीता जी
ReplyDeleteआप का बहोत बहोत धन्यवाद आपने डर से अवगत करवाया,चाहे वो डर किसी भी उम्र का हो,चीज़ की हो,बात की हो।
डर बहोत ज़रूरी भी है जीवन,यह हमें चैकन्ना रखता है ,हमें सुरक्षित रहने में मददगार रहता है ।
शायद आप को पता नहीं,भूल गई हों, मैं ने आप के इस डर को झेला है अपने ऊपर।
डर आप गयीं थीं शायद,ज़्यादा खुलासा यहाँ blog पर संभव नहीं,लेकिन twitter का ही वो episode है ।
खैर जाने दीजिये, आपके उस डर से मैं ने भी बहोत कुछ सीखा, अतः आप का कोटि कोटि धन्यवाद।
आप के उस डर ने मेरे अंदर किसी एक चीज़ को और प्रबल कर दिया है।
इसी के साथ आप भी उन महिलाओं में शामिल हो गयीं, जिंन्होंने मेरे अंदर कुछ और अच्छा करने कि प्रबलता को ईंधन दिया है, समय समय पर ।
अतः आप का फिर से धन्यवाद ।
आप का यह लेख सराहनीय है ,मैं अदना सा,आप के लेख के ऊपर टिपण्णी करना मेरी औकात नहीं, लेकिन मेरे समझ जहाँ तक है,उस के हिसाब से आप ने बहोत अच्छा लिखा है ।
मेरे व्याकरण कि कमियों को नज़र अंदाज़ कर दीजियेगा,मेरी यह प्रतिक्रिया पढ़ते वक़्त ।
आप का शुभ चिंतक
Adnasakavi सुशील
बहोत बढ़िया अनीता जी
ReplyDeleteआप का बहोत बहोत धन्यवाद आपने डर से अवगत करवाया,चाहे वो डर किसी भी उम्र का हो,चीज़ की हो,बात की हो।
डर बहोत ज़रूरी भी है जीवन,यह हमें चैकन्ना रखता है ,हमें सुरक्षित रहने में मददगार रहता है ।
शायद आप को पता नहीं,भूल गई हों, मैं ने आप के इस डर को झेला है अपने ऊपर।
डर आप गयीं थीं शायद,ज़्यादा खुलासा यहाँ blog पर संभव नहीं,लेकिन twitter का ही वो episode है ।
खैर जाने दीजिये, आपके उस डर से मैं ने भी बहोत कुछ सीखा, अतः आप का कोटि कोटि धन्यवाद।
आप के उस डर ने मेरे अंदर किसी एक चीज़ को और प्रबल कर दिया है।
इसी के साथ आप भी उन महिलाओं में शामिल हो गयीं, जिंन्होंने मेरे अंदर कुछ और अच्छा करने कि प्रबलता को ईंधन दिया है, समय समय पर ।
अतः आप का फिर से धन्यवाद ।
आप का यह लेख सराहनीय है ,मैं अदना सा,आप के लेख के ऊपर टिपण्णी करना मेरी औकात नहीं, लेकिन मेरे समझ जहाँ तक है,उस के हिसाब से आप ने बहोत अच्छा लिखा है ।
मेरे व्याकरण कि कमियों को नज़र अंदाज़ कर दीजियेगा,मेरी यह प्रतिक्रिया पढ़ते वक़्त ।
आप का शुभ चिंतक
Adnasakavi सुशील
सुशील जी मुझे सही में याद नहीं है की आप किस डर की बात कर रहे हैं .. पर इस बात से असहमत हूँ की डर ज़रूरी है .. डर किसी भी तरह का नुक़सान ही पहुँचाता है .. वैसे भी हम तभी डरते हैं जब हमने कुछ ग़लत किया होता है .. डर झूठ को जन्म देता है .. कई बार हम सम्मान रखने के लिए या शिष्टाचारवश भी झूठ बोलते हैं पर अधिकतर डर से बोलते हैं
Deleteडर जानलेवा भी होता है ..साँप काटने से लोग कम मरते हैं ज़्यादा इस डर से की साँप ने उन्हें काट लिया है और उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है जिनसे उनकी मौत हो जाती है .., देखिए आपने लिखने के लिए एक विषय दिया डर .. बहुत लिख सकती हूँ.. पर डर ग़लत है चाहे किसी भी रूप में हो..डर हमें खुल कर जीने नहीं देता और न ही कुछ पूछने की आज़ादी देता है ..
बाक़ी कमी हम सब में है .. जितना सुधार सकते हैं सुधरिये और कुछ को तो नज़रअन्दाज़ भी कीजिए ..
मेरे कारण अगर आप कुछ भी अच्छा कर पाए तो ये मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा पुरस्कार होगा.. ज़िंदगी से इससे ज़्यादा कुछ नहीं माँगा है
शुक्रिया की आपने इस लेख को कॉमेंट करने लायक समझा..पुनः धन्यवाद
बच्चों की मनोव्यथा को शब्दों में बखूबी उतारा है, हम भी राजीव जी का तहे दिल से शुक्रिया करते हैं जिनकी वजह से आपका (जो आमतौर पर हम सबके जीवन का परिचय है ) अनूठा परिचय मिला। बहुत सुन्दर लिखा है । आपकी किताबों की जर्नी में आपके अनुभवों से हमें भी कुछ सीखने को मिलेगा ऐसा हमारा यकीन है, बस आप इसी तरह अपने अनुभव बांटती रहें।
ReplyDeleteशुक्रिया मक्कड जी .. स्कूल के अनुभव हम सब के होते हैं.. वही एक समय है जब समय समय लगता है .. स्कूल का एक साल एक साल लगता था ..बाद में तो समय भाग रहा होता है .. लिखने का मन करता है तो लिख देती हूँ .. और अब तो पक्का लिखूँगी .. ध्यान से आप भी एक पात्र हो सकते हैं 😀
Delete