Tuesday, 10 January 2017

न रास्ता न मंज़िल पर हम निकल पड़े

रास्ता मंज़िल पर हम निकल पड़े
थी बात कुछ नहीं और हम चल पड़े

कुछ खोया हुआ पाया या पाया खो दिया
कुछ समझा नहीं क्यूँ मेरे आँसू निकल पड़े

एक मुलाक़ात की तमन्ना मुद्दातों से थी हमें
पर ऐसा हुआ वो आये पर देखे बिना चल पड़े

जिनकी यादों को लगा था हमने दिल से भुला दिया
आज याद आया तो लगा कहीं कलेजा न निकल पड़े

अब उन्हें ख़्वाबों में भी हम न बुलाएँगे
तू चैन से सोये तुझे न कोई ख़लल पड़े

   

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