टूटे थे ख़ुद ही इसलिए
हर शख़्स तोड़ता गया
टूटे को तोड़ने में किसी
को दर्द भी कब हुआ
इक ख़्वाब को हमने क्यूँ
ज़िंदगी माना था
आज नींद टूटी तो देखा
वो ख़्वाब भी गया
सिर्फ़ ज़ख़्म को हमने
दिया हक़ तबाह करने का
ख़ुद को तबाह करने का
हक़ हमने सबसे ले लिया
आज भी उस दिन को बस हम बद्दुआं
हैं दे रहे
उम्मीद नाम का एक शख़्स
जब हमसे था मिला
सच है यक़ीं हमें
दुनियाँ में किसी पर नहीं रहा
पर सच ये भी हैं की आप
ही हैं इसकी वजह
क्यूँ खुदा तेरे दामन
में मेरे लिए कुछ भी नहीं
दर्द सहने की भी तो तू
दे सकता था कुछ दवा

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