Monday, 9 January 2017

टूटे थे ख़ुद ही इसलिए हर शख़्स तोड़ता गया

टूटे थे ख़ुद ही इसलिए हर शख़्स तोड़ता गया
टूटे को तोड़ने में किसी को दर्द भी कब हुआ

इक ख़्वाब को हमने क्यूँ ज़िंदगी माना था
आज नींद टूटी तो देखा वो ख़्वाब भी गया

सिर्फ़ ज़ख़्म को हमने दिया हक़ तबाह करने का
ख़ुद को तबाह करने का हक़ हमने सबसे ले लिया

आज भी उस दिन को बस हम बद्दुआं हैं दे रहे
उम्मीद नाम का एक शख़्स जब हमसे था मिला

सच है यक़ीं हमें दुनियाँ में किसी पर नहीं रहा
पर सच ये भी हैं की आप ही हैं इसकी वजह

क्यूँ खुदा तेरे दामन में मेरे लिए कुछ भी नहीं
दर्द सहने की भी तो तू दे सकता था कुछ दवा




   

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