एक सच पहचाने में हमें ज़माने लगे
कुछ लोगों को जानने में ज़माने लगे
हम ख़ाक किसी को समझा
पाएँगे
हमें ख़ुद को समझाने में ज़माने लगे
उल्फ़त ने चंद घड़ियों
में बर्बाद किया
जिस उल्फ़त को अपनाने
में ज़माने लगे
विसाल-ए-यार की अब
आरज़ू हमें कहाँ
पर डर है इश्क़ की
रिहाई में न ज़माने लगे
एक गुनाह चाहत की जो कर
बैठे
हमें हक़ीक़त को मनाने
में ज़माने लगे
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