Wednesday, 27 September 2017

हर किसी का अपना दर्द अपनी ही सजा है

हर किसी का अपना दर्द अपनी ही सजा है 
कोई खुद से खफा कोई हालात से गमज़दा है

कुछ ख्वाहिशों ने भी तोड़ी है हमारी उम्मीदें  
वर्ना अँधेरा कब सुबह के कहने पे रुका है

कुछ रिश्ते खुद-ब-खुद ही टूट जाते 
हर बार गलतियों की नहीं होती खता है

अब दर्द खुद को कुछ गुनगुना चाहता है 
खामोश रहने की इसे मिल चुकी सजा है

अश्क दिल की ही एक आवाज है 
जहन से कहाँ कोई इसका रिश्ता है

न जाने कब कोई तारा सुस्ताना चाहे 
आँगन आज भी हमने खुला ही रखा है  


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