दिल सच का करता क्यूँ इक़्तिबाल नहीं
वक्त के साथ चलने को क्यूँ ये तैयार नहीं
चमड़ी की कितनी परतों के बीच छुपा है
इक नाम मिटाने का क्या कोई औजार नहीं
वक्त को भी अब समझना होगा
दर्द का होता इतना व्यापार नहीं
इक उम्मीद आज भी क्यूँ टूटती नहीं
इश्क किसी को पाने का तो हथियार नहीं
चलो अब खुद को भी मना ले
इतनी देर रूठना अच्छा मेरे यार नहीं
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