खामोशियों की भी मिलती सजा है
खामोशियों की भी मिलती सजा है
वक्त को भी हमसे कितना गिला है
क्यूँ हम उस मुकाम पे जायें
जहाँ वक्त भी खुद से खफा है
हम हर सच से अपनी ब-खूबी वाकिफ हैं
क्या कीजे जब किस्मत में झूठ लिखा है
इश्क का कोई कैसे ऐतबार करे
हर आशिक भटकता ही मिला है
बे-इख़्तियार है ये ज़िन्दगी
और मौत इसका सिला है
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