Monday, 25 September 2017

आईना देख कर हमने रूप संवारा है

आईना देख कर हमने रूप संवारा है 
कैसे माने आईने को हर सच गंवारा है 

आईने को बस चेहरा दिखता है   
दिल आज भी कितना बेसहारा है 

खूबसूरती क्या चेहरे में ही बसी है 
आईने ने तो बस चेहरा ही उभारा है 

आईने को धोखा देने की फिर सोची है 
साजिशों से हमने हर दाग छुपा डाला है

ज़िन्दगी भी कुछ आईने से ही बन गई 
झूठी मुस्कान से चेहरा लगता प्यारा है

आज फिर खुद का सच जानना है 
आज फिर झूठे आईने का सहारा है 




  

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