कुछ बातों को जो खुद से छुपा बैठे
यूँ लगा हम खुद को ही भुला बैठे
कुछ वक्त को भुलाने की कोशिश में
वक्त-बे-वक्त हम खुद के पास आ बैठे
हम जिन्हें भूल कर भूल न पाए
वो वक्त से हर रिश्ता निभा बैठे
कैसे हम उन्हें जिंदगी से मिटा दे
दिल में जो खुद को छिपा बैठे
ज़िन्दगी जीने की भी फुर्सत नहीं
ऐसे हालत में कौन याद आ बैठे
उम्मीदों को अब कल का ही सहारा
क्या जाने कल वक्त वफ़ा निभा बैठे
अब कुछ रात का रहे ख्याल
दिन तो हम यूँ ही गवाँ बैठे
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