चलिए इक बार खुद से कुछ आरज़ू करे
जिसमें सुकून का चाँद हो वो गुफ़्तगू करे
वक्त से इतनी बेरुखी वक्त से शिकायतें
इस तरह ज़िन्दगी को न बे-आबरू करे
ख़ुशी दफ़अतन जहाँ मोड़ से मिले
वैसी कुछ राहों की अब जुस्तजू करे
वक्त के साथ कुछ हम भी बदल जायें
दूसरों की ख़ुशी के लिए ये आरज़ू करे
अँधेरा कभी भी सामने आएगा नहीं
बस आफ़्ताब से खुद को रु-ब-रु करे
No comments:
Post a Comment