अजीब उलझनों में हम खुद को जिये जा रहे हैं
कभ खुद को भूलना चाहें कभी आवाज लगा रहे है
कभी जी करे खुद से रु-ब-रु हो लें
कभी खुद को बे-हिसाब सता रहे हैं
बहुत मुश्किल है दिल को सच समझाना
झूठी बातों से हम दिल का दिल बहला रहे हैं
कैसे हम खुद को उनसे छुपाये
जो ख्वाबों में आ हमें जगा रहे हैं
लीजिये हम छोड़ आयें पीछे वो दुनिया
फिर क्यूँ कुछ लफ़ज़ हमें चौंका रहे हैं
वो नाम ही क्यूँ जहन में बार बार आये
जब लोग इश्क़ के तराने गुनगुना रहे हैं
देखिये आज फिर झूठ जीत के आया
सच आज भी बस घर से चिल्ला रहे हैं
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