ज़िन्दगी की रुस्वाई क्यूँ भला
वक्त से बेवफ़ाई क्यूँ भला
कफ़स की खुद को सज़ा दे
इतनी भी तन्हाई क्यूँ भला
बे-दाद पर यूँ दाद देना
हमसे सौदाई क्यूँ भला
अपनी ही कहना अपनी ही सुनाना
इस तरह की तानाशाही क्यूँ भला
ख़ुद की ही सूरत से अनजान हो
बेरुखी की ये बीनाई क्यूँ भला
आफ़ाक़ पे आसमान आएगा नहीं
इतनी लम्बी ये अंगड़ाई क्यूँ भला
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