Monday, 18 September 2017

ज़िन्दगी की रुस्वाई क्यूँ भला

ज़िन्दगी की रुस्वाई क्यूँ  भला
वक्त से बेवफ़ाई क्यूँ भला

कफ़स की खुद को सज़ा दे 
इतनी भी तन्हाई क्यूँ भला 

बे-दाद पर यूँ दाद देना 
हमसे सौदाई क्यूँ भला  

अपनी ही कहना अपनी ही सुनाना 
इस तरह की तानाशाही क्यूँ भला

ख़ुद की ही सूरत से अनजान हो 
बेरुखी की ये बीनाई क्यूँ भला  

आफ़ाक़ पे आसमान आएगा नहीं 
इतनी लम्बी ये अंगड़ाई क्यूँ भला 


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