कभी खुद से कभी वक्त से गुफ़्तगू की है
इश्क़ की कुछ इस तरह हमने बंदगी की है
कोई हमें इससे ज्यादा क्या सताएगा
इश्क़ को मार कर हमने ज़िन्दगी जी है
इश्क़ जिस्म की नहीं रूह की जागीर है
मौत के लिए सबने ये साजिश रची है
इश्क़ जावेदां है ये सच भी खुद में झूठ है
इस झूठ को सजा कर हमने दोस्ती की है
इश्क़ सच्चा या झूठा कभी होता नहीं
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