ख़ुद को फिर से जीने को
तैयारी है
ख़ुद को पहचाने की
हमारी बारी है
आज ख़ुद को आईने में
देख ख़ुद ही चौंक गए
इस शख़्स से दोस्ती में
क्यूँ इतनी दुश्वारी है
ख़ुद से लड़ने में हम
क्यूँ हारते रहे
ख़ुद के खेल में हम क्यूँ
अनाड़ी हैं
इश्तिहार चलिए कुछ ख़ुद
का ख़ुद को दे दे
ख़ुद से ख़ुद का सौदा
करने की भी तैयारी है
बहुत आज़माया है इन
उजालों को
अब अंधेरों से बंधी
उम्मीदें हमारी है
Nice post ! Keep writing !
ReplyDeleteThanks....have started :)
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