मैं क्यूँ नहीं वो देख रही जो सबको दिखा है
राधा और कृष्ण का प्रेम मुझे क्यूँ अधूरा-सा लगा है
मैं ख़ुद को ये बात क्यूँ समझा नहीं पाई
राधा के प्यार का ख़ुद को यक़ीन क्यूँ दिला नहीं पाई
मेरी सोच क्यूँ कहे
वासुदेव का राधा के प्रति प्यार कभी नहीं पूरा था
राधा के प्रति गोविंद का हर कर्तव्य अधूरा था
क्यूँ मथुरा में रहकर प्रभु ने वृंदावन से नाता तोड़ा
क्यूँ बचपन के हर सखा को प्रभु ने यूँ ही छोड़ा
दूसरी सोच ये कहती है
गोपाल तो बच्चे थे जब उन्होंने वृंदावन छोड़ा
यानी बाल गोपल ने था राधा संग नाता जोड़ा
बारह वर्ष की उम्र बच्चे के खेलने-खाने की है
माना प्रीत करने की है पर क्या प्रीत जानने की है
तो कैसे मानूँ कि मुरलीधर ने राधा को अपना सब कुछ दिया
क्यूँ लोगों ने बाँके-बिहारी के संग राधा का रिश्ता जोड़ दिया
बारह वर्ष की उम्र में जगदीश ने प्यार को कितना जाना होगा
अगर प्यार किया भी था तो क्या प्यार का सच पहचाना होगा
महेंद्र ने दुनियावालों को जीने की राह दिखाई
प्राणियों को दुनिया में प्रेम की रीत सिखाई
हर राह पर सबको आध्यात्मिक बातें बताई
पूरे ज्ञान के सागर थे हमारे प्रभु रघुराई
जिस रुक्मणी को कभी प्रभु ने देखा न था
उसकी एक आवाज़ पर उठ कर चल दिए
रुक्मणी को पाने के लिए कितने खेल आपने रचे
प्रभु आपके ये खेल राधा के लिए हमें क्यूँ नहीं दिखे
रुक्मणी को पाने के लिए आपकी पूरी फ़ौज थी आई
सही है न प्रभु आपने उसके लिए लड़ी थी एक लड़ाई
आपने रुक्मणी से पूरी निष्ठा से व्याह भी था रचाया
क्या राधा का ख़याल आपने मन में तब भी नहीं आया
पिताम्बर के व्याह की और कितनी सारी कहानियाँ
सत्यभामा और भी तो आपकी अनगिनत रानियाँ
फिर क्यूँ राधा आपकी बस रही एक दीवानी
फिर क्यूँ नहीं आपने राधा की सुध जानी
राधा एक ग्वालन और प्रभु आप नरेश थे
मुझे नहीं लगता आपके मिलन द्वेष थे
तो ऐसी क्या मजबूरी केशव आपके पास आई
हज़ारों रानियों में राधा ने जगह क्यूँ नहीं बनाई
किस लिए राधा का प्यार अंत तक अर्धांश रहा
क्यूँ फिर प्रभु आपने राधा संग सिर्फ़ रास रचा
हमने ये भी सुना है राधा का विवाह हो चुका था
तो प्रभु क्या ये भी किसी तरह की बाधा थी
लगता है मुरलीमनोहर या तो राधा को बस यूँ ही बहलाया
या लोगों ने राधा की तड़प को देख इसे अमर प्रेम बतलाया
अगर प्रभु आपने राधा के दर्द को थोड़ा भी जाना होता
तो दयानिधि आपके पास वृंदावन जाने का भी बहाना होता
नहीं प्रभु मेरे पास न सबूत न ही कोई गवाह है
जो भी थोड़ी जानकारी है ये सब उसी ने कहा है
माना सुदर्शन आपने प्रभु रूप में जन्म था पाया
पर आपने मनुष्य वेश को ही तो था अपनाया
इतना सब जानने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर आई हूँ
जगदीश राधा के प्रेम को एक तरफ़ा ही मान पाई हूँ
क्या राधा को बहलाने के लिए मुरलीधर ने प्रेम का सहारा लिया
या किसी ने एक तरफ़ा प्रेम की तड़प को अमर प्रेम का नाम दिया
आज भी यही चलन हर तरफ़ दिख रहा है
जो न मिला उसे ही लोगों ने महत्व दिया है
हर तरफ़ प्यार में लोग टूटे हुए दिखते हैं
सांत्वना के लिए इसे अमर प्रेम भी कहते है
प्यार पाना नहीं खोना है
टूटे लोगों का ये भी रोना है
पर हम मानते हैं, जो मिला वो ही सच्चा होता है
झूठा हर बार बहाने ले कर ख़ुद को ढोता है
ज़िंदगी प्रभु ने जीने को दिया है
प्यार के लिए रोना ये कौन सी सज़ा है
एक तरफ़ा प्यार सिर्फ़ रुलाएगा
जो न मिला वो बस तड़पायेगा
मरने के बाद किसने क्या कुछ भी है देखा?
ज़िंदगी तो बस साँसों की बंधी एक जीवन रेखा
क्या करेंगे उस प्रेम का जो दवा नहीं दर्द बन कर आएगा
माना मरने के बाद वो लोगों की भाषा में अमर प्रेम कहलाएगा
जय श्री कृष्णा ।बहुत ही सुंदर प्रस्तुति. बहुत पसंद आइ ।धन्यवाद
ReplyDeleteदिल की गहराई से धन्यवाद .....पसंद करने के लिए।
Deleteजय श्री कृष्णा ।बहुत ही सुंदर प्रस्तुति. बहुत पसंद आइ ।धन्यवाद
ReplyDeleteकब न राधा थी कान्हा के पास
ReplyDeleteउनके हर ओर थी वो धरती या आकाश
समाई थी उनकी साँसों में, आंखों में
हर पल उनके ख्यालों में, उनकी बातों में
क्रिशन की लीला क्रिशन ही जाने
Deleteहम तो आज भी कुछ अनजाने
पर लोग आज भी कहें राधा का प्यार अधूरा था
फिर कैसे माने राधा से उनका हर नाता पूरा था
जो रस खोने में है पाने में कहाँ
ReplyDeleteखोने पर दिल ढूंढता उसे यहां वहां
प्यार पाने वालों को भी देखा है पछताते
उससे बेहतर था वो कभी मिल ही न पाते
पाना खोने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी
Deleteप्यास के लिए पानी एक मजबूरी