Wednesday, 10 May 2017

कुछ दाग़ जो हमें रोज़ नज़र आ रहे थे

कुछ दाग़ जो हमें रोज़ नज़र आ रहे थे 
अब हम उसे वक़्त से छिपाने जा रहे थे 

हर बात में तंज करने का उनका अन्दाज़
वो हमपे वार करने का मौक़ा कब गवाँ रहे थे 

अंत में सब कुछ ठीक हो ही जाएगा
इसी उम्मीद में हम अंत को ही झुठला रहे थे

अगर दोस्ती कभी ख़त्म नहीं हो सकती
तो क्या हम दुश्मनी को दोस्ती बता रहे थे  

एक सौदा अब ख़ुद से हमने कर लिया  
ख़ुद के सच को हम झूठ से ख़रीदने जा रहे थे  





2 comments:

  1. तंज कसना ही तो उनका अंदाज़ था पुराना
    उनकी इस अदा को आप ही झुठला रहे थे
    दोस्ती का अंत खूबसूरत बनाने को आपकी कोशिशों में
    वो अपना स्वार्थ सिद्ध किए जा रहे थे

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    1. दोस्ती में कोई भी बोझ होता नहीं
      दोस्ती ख़ुद को लेने देने में खोता नहीं

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