Friday, 5 May 2017

गुलमोहर की पाँचवीं पंखुड़ी

हर वक़्त ख़ुद को देख ख़ुद से ही परेशान हूँ
क्यूँ मैं सबसे अलग क्यूँ नहीं सबके समान हूँ
मेरी चार बहनों ने एक रंग एक ही रूप पाया
क्यूँ भगवान ने मुझ पाँचवीं को अलग बनाया

बेढब सी कुछ लम्बी बन कर आई हूँ
रंग-रोगन क़ुदरत से अजीब-सी लाई हूँ
क्यूँ इतने दाग़ मेरे शरीर पर दिखे है
जीवन भी इन्हीं दाग़ों के साथ लिखा है

बहनों में मैं अलग-सी क्यूँ बनी हूँ
चारों बहनों जैसी क्यूँ नहीं दिखी हूँ
मेरी बहनों ने एक जैसा रंग है पाया
चेहरा भी सबने एक ही है अपनाया

क्यूँ मैं अभागन सबसे अलग नज़र आई हूँ
क्यूँ साथ अपने मैं ऐसी क़िस्मत लाई हूँ
यही सब सोच वो हवा के थपेड़े खा रही थी
पाँचवीं अपने आप से ये सब बतिया रही थी

हवा पाँचवीं पंखुड़ी की ये बातें सुन हैरान थी
पाँचवीं के ख़याल से हवा अब कुछ परेशान थी
हवा को लगा अब पाँचवीं को समझाना होगा
उसे अलग होने का सच भी दिखलाना होगा

हवा ने पाँचवीं को अब हौले से हिलाया
कुछ फूलों को डाली से नीचे भी गिराया
नीचे बैठे मुसाफ़िरों पर ध्यान उसको दिलाया
मुसाफ़िरों की हकारतों से उसे अवगत करवाया

मुसाफ़िर आपस में बतिया रहे थे
एक दूसरे को गुलमोहर दिखा रहे थे
सब पाँचवीं को गुलमोहर बता रहे थे
सब पाँचवीं को ही निहारे जा रहे थे

हवा अब गुलमोहर को देख कर मुस्कुराई
धीरे से उसके कान में वो फिर फुसफुसाई
चारों बहने आपस में बदली जा सकती हैं 
पर तुम्हारी बातें उनमें नहीं आ सकती हैं 

तुम्हें परेशानी क्यूँ सबसे अलग होने से है 
परेशानी तो एक-जैसा ख़ुद में ढोने से है
दूसरों की पहचान में ख़ुद को खोने में है
दूसरों को देख अपनी हालत पर रोने में है

दुनिया सबको एक जैसा बनाना चाहती है
सबको एक रूप ही में अपनाना चाहती है
असली चुनौती तो अलग बने रहने में है
सबके साथ रहते अपनी बात कहने में है

तुम्हारा अलग होना फूल गुलमोहर की जान है
ये पाँचवीं पंखुड़ी गुलमोहर की सच्ची पहचान है
अलग होना इस फूल की सुंदरता की निशानी है
गुलमोहर पाँचवीं पंखुड़ी से ही पहचानी जानी है


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