Friday, 6 October 2017

दौड़ता वक्त है क्यों वो फिर लौट कर आयेगा

दौड़ता वक्त हैं क्यों वो फिर लौट कर आयेगा
उम्मीदों की धूल है कि वक्त बदल जायेगा

चलिए एक बार फिर खुद को सतायें 
शायद दर्द ही दर्द को कुछ हँसायेगा 

ये रौशनी फिर शोर मचा रही है 
लगता है अब चिराग़ बुझ जायेगा

फूल को बिखरने की बातें न सुनायें   
मायूसी  से  वो यूँ  ही  मुरझायेगा 

हम थक चुके हैं अपनी इस जीत से 
जश्न जीत का अब कौन मनायेगा 

बार बार छूने से ज़ख्म भरता नहीं 
ये बात वक्त को कौन समझायेगा  




   

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