Tuesday, 10 October 2017

हर चेहरे ने अपना ज़ख़्म अपना गम बताया है

हर चेहरे ने अपना ज़ख़्म अपना गम बताया है 
किसी ने अश्क किसी ने मुस्कान से छिपाया है 

अपनी ही उम्मीदों से हम इतने घायल हैं
अपनी ही उम्मीदों ने हमें ज़ख्म पहुंचाया है

हम ख़ुद को अब कैसे पहचानेंगे 
वक्त का हम पे भी पड़ा साया है  

दिल कहे कुछ भूल कर मुस्कुराओ
यादों पे तो ग़मों का बादल छाया है

आपने देखिये हमें किस क़दर बदल दिया 
ये अहसान तो आपका हम पर बकाया है 

कुछ ज़ख्मों के साथ ही हमें चलना है  
देर से ही सही अब ये समझ आया है

न दिलदार न बेक़रार न इंतज़ार न इक़रार
ये कौन सा मक़ाम इश्क़ में हमने पाया है 

हम टूटे दिल से भी कहे इश्क़ को शुक्रिया 
उसने हमे अंधेरों में रास्ता तो दिखाया है 

हम खुद से क्यूँ इतने खफा हैं 
हमें भी तो खुदा ने ही बनाया है 



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