चलिए खुद को बदल कर देखते हैं
कहीं संभल जायें चल कर देखते हैं
गर्द नहीं जो हर जगह बस जायेंगे
माहौल के साथ मचल कर देखते हैं
ज़िन्दगी अहसासों में भी छिपी है
कुछ खुद में भी बिखर कर देखते हैं
कब तक काँटों से खुद को बचायेंगे
काटों को अब कुछ मसल कर देखते हैं
न दोस्ती न दुश्मनी रहे हमारे दरमियाँ
इस अंदाज़ को भी अमल कर देखते हैं
बहुत सुंदर...काँटो को अब कुछ मसल कर देखते हैं।।
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