Thursday, 5 October 2017

चलिए खुद को बदल कर देखते हैं

चलिए खुद को बदल कर देखते हैं 
कहीं संभल जायें चल कर देखते हैं

गर्द नहीं जो हर जगह बस जायेंगे 
माहौल के साथ मचल कर देखते हैं 

ज़िन्दगी अहसासों में भी छिपी है 
कुछ खुद में भी बिखर कर देखते हैं

कब तक काँटों से खुद को बचायेंगे   
काटों को अब कुछ मसल कर देखते हैं 

न दोस्ती न दुश्मनी रहे हमारे दरमियाँ 
इस अंदाज़ को भी अमल कर देखते हैं

   

1 comment:

  1. बहुत सुंदर...काँटो को अब कुछ मसल कर देखते हैं।।

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