Friday, 13 October 2017

ज़िन्दगी बस इतना सा तू मुझपे करम कर

ज़िन्दगी बस इतना सा तू मुझपे करम कर 
कुछ भूल जा कुछ न याद दिलाने की रहम कर 

हर सवाल का जवाब खामोशी बने 
इतना भी अब मुझपे तू न सितम कर

टूटी तस्वीरों से दीवारों को सजाएँ 
वक्त पर अब ऐसा भी न जुलम कर

बिखरी हुई भी खुद को समेट ले जाऊँगी 
बस टूटे को और न तोड़ने की तू रहम कर 

ज़ख़्मी हो कर भी ये पैर आगे ही बढ़ते जायेंगे 
अब तेरी मर्जी सर मेरा तू सरेआम कलम कर 





  

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