ज़िन्दगी बस इतना सा तू मुझपे करम कर
कुछ भूल जा कुछ न याद दिलाने की रहम कर
हर सवाल का जवाब खामोशी बने
इतना भी अब मुझपे तू न सितम कर
टूटी तस्वीरों से दीवारों को सजाएँ
वक्त पर अब ऐसा भी न जुलम कर
बिखरी हुई भी खुद को समेट ले जाऊँगी
बस टूटे को और न तोड़ने की तू रहम कर
ज़ख़्मी हो कर भी ये पैर आगे ही बढ़ते जायेंगे
अब तेरी मर्जी सर मेरा तू सरेआम कलम कर
कुछ भूल जा कुछ न याद दिलाने की रहम कर
हर सवाल का जवाब खामोशी बने
इतना भी अब मुझपे तू न सितम कर
टूटी तस्वीरों से दीवारों को सजाएँ
वक्त पर अब ऐसा भी न जुलम कर
बिखरी हुई भी खुद को समेट ले जाऊँगी
बस टूटे को और न तोड़ने की तू रहम कर
ज़ख़्मी हो कर भी ये पैर आगे ही बढ़ते जायेंगे
अब तेरी मर्जी सर मेरा तू सरेआम कलम कर
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