Saturday, 14 October 2017

मन ने सच कहा मन ने हर झूठ समझाया

मन ने सच कहा मन ने हर झूठ समझाया 
मन की बातों पर वक्त की भी न थी छाया 

झूठ को आज फिर सच कह कर दिखा दिया 
सच को आज फिर हमने वक्त से ही डराया 

सपनों को भी एक सौदागर चाहिए
हकीकत से अब ख्वाब भी घबराया

अश्क हाथों में आकर सूख ही जायेंगे 
ये सोच आँखों को हमने बहुत रुलाया 

देखिये ख़ुशी फिर अँधेरे में ही जा बैठ गई  
और चिराग भी मन का हमने नहीं जलाया

कोई हमारी नफरत के अब काबिल नहीं 
जब से डर अपने मन से हमने है हटाया

मन में गुजरने वालों को हम मन से दुआ दे 
मन के मेहमानों का हमने ऐसे कर्ज़ चुकाया 


   

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