मन ने सच कहा मन ने हर झूठ समझाया
मन की बातों पर वक्त की भी न थी छाया
झूठ को आज फिर सच कह कर दिखा दिया
सच को आज फिर हमने वक्त से ही डराया
सपनों को भी एक सौदागर चाहिए
हकीकत से अब ख्वाब भी घबराया
अश्क हाथों में आकर सूख ही जायेंगे
ये सोच आँखों को हमने बहुत रुलाया
देखिये ख़ुशी फिर अँधेरे में ही जा बैठ गई
और चिराग भी मन का हमने नहीं जलाया
कोई हमारी नफरत के अब काबिल नहीं
जब से डर अपने मन से हमने है हटाया
मन में गुजरने वालों को हम मन से दुआ दे
मन के मेहमानों का हमने ऐसे कर्ज़ चुकाया
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