हम आज फिर बोल गए हमें नहीं दिया है
सच ये भी जो नहीं मिला वो नहीं जिया है
हम क्यूँ क़िस्मत को हर बार क़सूरवार ठहराएँ
क़िस्मत को कुछ कुछ ख़फ़ा हमने भी किया है
वक़्त ने हथेलियों पे कितना कुछ लिख दिया
पर लोगों की नज़रों ने इसे ख़ाली लिया है
नासमझी को फिर समझदारी से समझाने चले
इसी समझदारी ने ही कितना कुछ छीन लिया है
हम कैसे मानें इबादत से कुछ नहीं हासिल
इसी खुदा ने तो बिन माँगे कितना दिया है
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